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जल संकट पर विशेषज्ञों की सलाह पर काम हो:बेसा

जल संकट पर विशेषज्ञों की सलाह पर काम हो:बेसा

गर्मी के शुरुआत से ही जल संकट गहराने लगा है जो गंभीर चिंता का विषय है। बिहार अभियन्त्रण सेवा संघ के महासचिव डा सुनील कुमार चौधरी ने गर्मी के शुरू होते ही गिरते भूगर्भ जल स्तर पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अधिकारियों की टीम समस्या को तलाश लेती है, लेकिन इनके निदान के लिए विशेषज्ञों व वैज्ञानिकों की राय नहीं ली जाती। भूमिगत जलस्तर के लगातार घटने का एक बड़ा कारण अवैध एवं बेलगाम भू जल दोहन व लोगों में जागरूकता का अभाव है। जल जीवन हरियाली के लिए हजारों करोड़ का प्रावधान है, लेकिन इसे वैज्ञानिक तरीके से क्रियान्वित करने की जरूरत है। हम एक तरफ पेड़ों को काट रहे है, दूसरी तरफ पानी की सप्लाई कर रहे हैँ व इसके ठीक विपरीत बोरवेल पर कोई प्रतिबंधि या नियंत्रण नहीं लगा रहे, तालाबों का सौंदर्यीकरण के नाम पर पक्कीकरण  कर रहे हैं। गंगा की जलग्रहण क्षमता इतनी कम हुई है कि इसके किनारे बसे शहरों में भी जल संकट का प्रभाव दिख रहा है। एक पेड़ हमें साल में 400 किग्रा ऑक्सीजन देता है, वहीं दो हजार किलो कार्बन सोखता है। एक परिवार यदि अपने आसपास 10 पेड़ लगाये तो परिवार की औसत आयु सात वर्ष बढ़ जाती है, जलस्तर पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। जिस तेजी से कानूनी व गैर कानूनी तरीके से पेड़ों को साफ किया जा रहा है, नदियों के गाद की सफाई नहीं हो रही, आहर पईन का अस्तित्व मिट रहा है, तालाब कुओं का पक्कीकरण हो रहा है, उसमें स्थिति आज से और भयावह होगी। साल भर में होने वाली कुल बारिश का कम से कम 31 प्रतिशत पानी धरती के भीतर रिचार्ज के लिए जाना चाहिए. लेकिन एक शोध के मुताबिक,कुल बारिश का औसतन 13 प्रतिशत पानी ही धरती के भीतर जमा हो रहा है ।
आपदा रोधी समाज निर्माण आन्दोलन के पर्याय बन चुके डॉ. चौधरी ने भूगर्भ जल समस्या का निदान हेतु निम्न सुझाव दिये-

जल संरक्षण के उपाय
– अधिक से अधिक रेन हारवेस्टिंग सिस्टम लगाए जाएं।
-नदियों को अविरल बहने देना व प्राकृतिक जल स्रोतों को मूल रूप में रहने देना
– कपास, सरसों, अरहर, मूंग आदि कम सिंचाई की जरूरत वाली फसलें उगाई जाएं।
-सिंचाई के लिए टपका व फव्वारा विधि का इस्तेमाल किया जाए।
– सरकार को पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 को कड़ाई से लागू करना होगा जिसके तहत भूमिगत जल के अनियंत्रित दोहन पर अंकुश लगाने का प्रावधान है.’

किन्तु असली सवाल यह है कि क्या तमाम राजनीतिक विवादों से जूझती सरकार इस अहम समस्या के समाधान के मामले में दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देगी? ऐसा नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब राज्य बडी आबादी बूंद-बूंद के लिए तरसती नजर आएगी।

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