मिथिला के मखान की ब्रांडिंग बिहार के नाम से किए जाने की साजिश पर विद्यापति सेवा संस्थान ने जताई आपत्ति
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मिथिला
के मखान की ब्रांडिंग को लेकर बिहार सरकार द्वारा राजनीति शुरू किए जाने पर विद्यापति सेवा संस्थान ने कड़ी आपत्ति जताई है। संस्थान के महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने बुधवार को कहा कि मिथिला के मखान की ब्रांडिंग बिहार के नाम से किए जाने कि बिहार सरकार साजिश रच रही है, यह सर्वथा अनुचित है। सरकार के इस मंसूबे को मिथिला की आठ करोड़ जनता कामयाब नहीं होने देगी।
उन्होंने कहा कि मिथिला की सांस्कृतिक पहचान के रूप में मखान का नाम जगजाहिर है- पग-पग पोखर माछ, मखान। मिथिला देश में मखान का सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र है। लिहाजा, इसकी ब्रांडिंग निश्चित रूप से मिथिला के मखान के रूप में होनी चाहिए न कि बिहार के मखान के रूप में। उन्होंने कहा कि मिथिला में मखान की खेती को युद्ध स्तर पर बढ़ावा देने के लिए इसकी ब्रांडिंग मिथिला मखान के नाम से करते हुए इस उद्योग का विकास किया जाना चाहिए ताकि इससे होने वाली आय को न सिर्फ मिथिला क्षेत्र के विकास में लगाया जा सके, बल्कि इससे मिथिला में रोजगार सृजन की संभावना भी मजबूत हो सकेगी।
मैथिली अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पं कमला कांत ने केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा मखाना उत्पादकों के लिए राहत पैकेज का ऐलान किए जाने का स्वागत करते कहा कि इससे मिथिला को काफी लाभ होगा। लेकिन यदि इसकी ब्रांडिंग बिहार मखाना के रूप में की गई तो इससे होने वाले लाभ की बंदरबाट शुरू होना अवश्यंभावी है।
एमएलएसएम कालेज के प्रधानाचार्य एवं प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक डॉ विद्यानाथ झा ने कहा कि मखाना मिथिलांचल में पाए जाने वाले दुर्लभ वनस्पतियों में से एक है। भारत में मखाना उत्पादन का 75 प्रतिशत भाग बिहार व उसमें से लगभग 50 प्रतिशत भाग मिथिला उत्पादन का केंद्र है, लेकिन उचित संरक्षण के अभाव में इसका विकास नहीं हो रहा है। हालांकि इसका उत्पादन बढ़ाने के लिए दरभंगा में अनुसंधान केंद्र भी स्थापित है, लेकिन फंडिंग के अभाव में इसका सही फायदा मखान उत्पादकों को नहीं मिल पा रहा है। यदि जीआई टैग के तहत इसकी ब्रांडिंग मिथिला मखान के नाम से होगी तो इस क्षेत्र में मखान उत्पादन को काफी बढ़ावा मिल सकेगा।
एमएलएसएम कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य डाॅ अनिल कुमार झा ने कहा कि मखाना उत्पादन के लिए मिथिला का मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, कटिहार, पूर्णिया व चंपारण जिला मुख्य है। यदि इसकी ब्रांडिंग बिहार के नाम से की गई तो इसका क्षेत्रीय परिसीमन बिहार की परिधि में होगा और इसका खामियाजा सीधे तौर पर मिथिला के लोगों को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि मिथिला के 20 जिलों मे मखान की खेती होती है ऐसे में इसकी ब्रांडिंग मिथिला के नाम से किए जाने पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। जबकि मात्र चार जिलों में सिमटी मगही पान की खेती पर इसकी ब्रांडिंग मगही पान के नाम से हो चुकी हो।
प्रो जीवकांत मिश्र ने कहा कि मिथिला में मखान की खेती अभी भी पारंपरिक तरीके से होती है। मखान बोने से लेकर इसे पोखरा से निकालने व फोड़ने तक परंपरागत विधि ही अपनाई जाती है। जिस कारण इसका भरपूर उत्पादन संभव नहीं हो पा रहा है। केन्द्रीय मदद से इलाके के किसानों में आशा की किरण जगी है, लेकिन इस पर हो रही राजनीति ने उनके चेहरे की खुशी को मायूसी में बदल दिया है।
प्रवीण कुमार झा ने कहा कि मखाना का मिथिला के नाम से ब्रांडिंग होने से मखाना विपणन की बेहतर सुविधा यहाँ के मखाना उत्पादकों को मिल सकेगी। मिथिला के मखाना को दुनिया के 100 में से 90 देशों के लोग बड़े चाव से खाते हैं। यही कारण है कि दुनिया के मखाना उत्पादन में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 85 से 90 फीसदी है। मखाना की ब्रांडिंग होने से मखाना उद्योग में जान आना निश्चित है। लेकिन इसके किसी भी राजनीति से परहेज करते हुए इसकी ब्रांडिंग मिथिला के नाम से किया जाना निहायत जरूरी है। वरना इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए मिलने वाले फंड की बंदरबांट शुरू हो जाएगी।
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