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‘ईकोलाॅजी ऑफ इन्वेसिव प्लांट पार्थेनियम हिस्टीरोफोरस’ विषय पर वेब व्याख्यान आयोजित।। अजित कुमार सिंह की रिपोर्ट

‘ईकोलाॅजी ऑफ इन्वेसिव प्लांट पार्थेनियम हिस्टीरोफोरस’ विषय पर वेब व्याख्यान आयोजित
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सीएम साइंस कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग द्वारा ऑनलाइन वेब लेक्चर सीरीज “अंडरस्टैंडिंग साइंस एंड सोसाइटी” के तहत आयोजित वेब व्याख्यान में जेपी विश्वविद्यालय, छपरा के पूर्व प्रति-कुलपति एवं स्नातकोत्तर वनस्पति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ अशोक कुमार झा ने दिया व्याख्यान
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पार्थेनियम हिस्टीरोफोरस विशेष रूप से अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला सूरजमुखी कुल का एक तरह का विषैला खरपतवार है। जिसे श्वसन संबंधी एलर्जी, त्वचा में सूजन, मानव और पशुधन में उत्परिवर्तन का कारण माना जाता है। इसके कारण जहां फसल का उत्पादन काफी हद तक कम हो जाता है, वहीं इसके आक्रामक वर्चस्व के कारण जैव विविधता को हमेशा खतरा बना रहता है।
उक्त बातें सीएम साइंस कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग द्वारा ऑनलाइन वेब लेक्चर सीरीज “अंडरस्टैंडिंग साइंस एंड सोसाइटी” के अंतर्गत ‘ईकोलाॅजी ऑफ इन्वेसिव प्लांट पार्थेनियम हिस्टीरोफोरस’ विषय पर आयोजित वेब व्याख्यान में अपने विचार रखते हुए जेपी विश्वविद्यालय, छपरा के पूर्व प्रति-कुलपति एवं स्नातकोत्तर वनस्पति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ अशोक कुमार झा ने कही।
अपने व्याख्यान में उन्होंने बताया कि भारत के लिए यह एक तरह का आयुर्वेदिक पौधा है, जिसे सामान्य तौर पर गाजर घास या कांग्रेस घास के नाम से जाना जाता है। इसकी प्रजनन क्रिया बड़ी ही तीव्रता से होती है। यही कारण है कि यह पौधा बड़ी तेजी से व्यापक रूप में संपूर्ण विश्व में फैल गया है और विभिन्न परिस्थितिकी तंत्र एवं जैव विविधता को चुनौती दे रहा है।
उन्होंने बताया कि हाल ही में इस लिथो कुख्यात संयंत्र के कई अभिनव उपयोग किए गए हैं और इसके आधार पर पार्थेनियम हिस्टीरोफोरस त्वचा के सूजन, आमवाती दर्द, दस्त, मूत्र पथ के संक्रमण, पेचिश, मलेरिया और नसों के दर्द के लिए काफी उपायोगी साबित हुए हैं। जबकि नैनो-मेडिसिन के रूप में इसकी संभावना अब तक कुछ प्रारंभिक सफलता के साथ चल रही है।
उन्होंने बताया कि खतरनाक गुणों के लिए जिम्मेदार हिस्टेरोफोरस में एक खरपतवार के रूप में, प्रभावी नियंत्रण उपायों के साथ ही अनेक लाभकारी संभावनाएं भी निहित हैं, जिसे उजागर करने के लिए अनेक शोध किए जा रहे हैं।
व्याख्यान की अध्यक्षता करते हुए प्रधानाचार्य डॉ प्रेम कुमार प्रसाद, जो स्वयं वनस्पति विज्ञान विषय के शिक्षक भी हैं, ने बताया कि भारत में सर्वप्रथम यह घास 1955 में पूना (महाराष्ट्र) में देखी गई थी। माना जाता है कि हमारे देश में इसका प्रवेश 1955 में अमेरिका व कनाडा से आयातित गेहुँ के साथ हुआ। आज ये घातक खरपतवार पूरे भारत वर्ष में लाखों हैक्टेयर भूमि पर फैल चुका हैं। यह घास मुख्यत: खुले स्थानों, औध्योगिक क्षैत्रों, सड़कों के किनारे, नहरों के किनारे व जंगलों में बहुतायात में पाया जाता हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने उम्मीद जताई कि “अंडरस्टैंडिंग साइंस एंड सोसाइटी” के तहत विभिन्न विषयों पर आयोजित हो रहे वेब व्याख्यान अपने मूलभूत उद्देश्य की पूर्ति में कामयाब होगा।
इस वेब व्याख्यान में भागीदारी के लिए कुल 389 प्रतिभागियों ने अपना पंजीयन कराया, जबकि 254 से अधिक प्रतिभागियों ने अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज की। इनमे विभिन्न महाविद्यालयों व स्नातकोत्तर विभागों के शिक्षक, छात्र एवं शोधार्थी सम्मिलित हुए।
वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ सुनीला दास के संयोजन एवं डाॅ दिलीप कुमार झा के कुशल संचालन में आयोजित इस वेब व्याख्यान के आयोजन में जंतु विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ अरविंद कुमार, वनस्पति विभाग के वरीय शिक्षक डॉ रजी अहमद, महाविद्यालय के बर्सर डॉ अशोक कुमार झा व डॉ खालिद अनवर के साथ ही तकनीकी सहायक के रूप में आईक्यूएसी सहायक प्रवीण कुमार झा एवं स्थापना सहायक चेतकर झा की उल्लेखनीय सहभागिता रही।

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