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ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग द्वारा ” पारम्परिक लोक नाट्य के सौंदर्य ” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय ई संगोष्ठी

सबसे बड़ा सौंदर्य अंधेरा है जब आंखें बन्द होने से सारी दृष्यें दिल व दिमाग से देखें जाते हैं। जीवन का सौंदर्य हमारे गुनगुनाने में है।जब कोई संगीत बजता है तो उसके सौन्दर्य हमारे सामने तस्वीर की तरह आता है। उक्त बातें  ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग द्वारा ” पारम्परिक लोक नाट्य के सौंदर्य ” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय ई संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र

Edit By-ajit kumar singh

में बतौर मुख्य अतिथि सह कुलसचिव डा मुश्ताक अहमद ने कही। उन्होंने कहा कि सर्वप्रथम हबीब तनवीर ने लोक परम्परा को नाट्य में बदलने का कार्य आरंभ किया जो हमारे यहां के लोक कलाकार भिखारी ठाकुर ने किया था। उन्होंने विज्ञान की तुलना कला से करते हुए कहा कि विज्ञान मस्तिष्क से पैदा होता है जबकि कला दिल की गहराई से पैदा होता है।

विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठियों की द्विदिवसीय श्रृंखला के दूसरे दिन नाट्य विषयक राष्ट्रीय ई संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 10 फरवरी 2021को किया गया।
उद्घाटन सत्र के बाद प्रथम तकनीकी सत्र में बंगलोर से जुड़े विद्वान कथाकार,नाटककार, रंग समीक्षक श्री हृषीकेश सुलभ ने अपने बीज व्याख्यान में विस्तृत रूप से विषय को स्थापित किया। उन्होंने कहा कि नाट्य के सौन्दर्य को देखने परखने के लिए दृष्टि होनी चाहिए। हमारा पारम्परिक नाट्य बहुत विशाल है,यह विविधता सम्पूर्णता को प्रमाणित करती है। उन्होंने सूत्रधार,विदूषक ,अभिनेता,नाटक का संगीत, शैलियां आदि का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया ।विदूषक में कायान्तरण की अद्भुत शक्ति है ,इसका आधुनिक रंगमंच में खूब प्रयोग हुआ है जो लोक से ही लिया गया है।अभिनेता की नैसर्गिक प्रतिभा को अवसर देना पारम्परिक नाटकों में महत्वपूर्ण है जिसका आधुनिक रंगमंच में प्रयोग करना आवश्यक है।नाटक की शैलियों के सौन्दर्य की बात करें तो सौन्दर्य के असंख्य उदाहरण हैं।संगीत नाटक का महत्वपूर्ण तत्व है।
उन्होंने विशेष रूप से कहा कि आज रंगकर्मी बौद्धिक विमर्श से भाग रहे हैं ,इस ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहिए।
संगोष्ठी के तृतीय सत्र और द्वितीय तकनीकी सत्र के विषय विशेषज्ञ थे विद्वान नाटककार डा अविनाश चन्द्र मिश्र। उन्होंने पारम्परिक लोक नाट्य का सौन्दर्य विषयक विद्वद् व्याख्यान में कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं को सोदाहरण चिन्हित किया। लोक नाटक लाउड होता है,उनके वस्त्र विन्यास चटकीले होते हैं,इनके आंगिक,वाचिक अभिनय के तत्वों पर शोध कार्य होना चाहिए। लोक तत्व के अनेक उद्धरणों द्वारा डा मिश्र ने पारम्परिक लोक नाट्य का सौन्दर्य विषय को बहुत सुन्दर ढंग से स्थापित किया।
तृतीय तकनीकी सत्र में डा सन्तोष कुमार राणा ने बिहार के लोक नाट्य और सौन्दर्य विषय का निरूपण करते हुए कहा कि हम जिस लोक परमपराओं के बारे में जानते हैं वह सीधे लोक से आयी हैं ,ऐसा नहीं है।इसके पूर्व भी शास्त्रीय रंगमंच के तत्व हमें देखने को मिलते हैं।डा राणा ने कहा कि बिहार में कुल तीन तरह के रंगमंच की अवधारणा है -प्रथम शास्त्रीय रंगमंच की अवधारणा से युक्त अर्थात कीर्तनिआ,विदापत आदि,दूसरा अनुष्ठान आधारित अर्थात जट जटिन,सामा चकेवा आदि और तीसरा सामाजिक मुद्दों पर आधारित यथा विदेसिया आदि। विभिन्न उदाहरणों द्वारा विषय को सिद्ध किया।
चतुर्थ तकनीकी सत्र में डा जैनेन्द्र दोस्त ने भिखारी ठाकुर के नाच के सौन्दर्य विषय पर अपना व्याख्यान सोदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने भिखारी ठाकुर के जीवन,लोक नाट्य विधा नाच और भिखारी ठाकुर के नाटकों के विषय यथा- मजदूरों का पलायन,बाल विवाह,दहेज प्रथा और महिला सशक्तिकरण को विशेष रूप से विश्लेषित किया। विभिन्न गेय उदाहरणों के द्वारा विषय को जीवन्त बना दिया।

इस संगोष्ठी का रिपोर्ट संगोष्ठी की संयोजिका प्रो लावण्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ ने प्रस्तुत किया।

विश्वविद्यालय के कुलगीत एवं दीप प्रज्वलन से आरंभ इस सत्र में सर्वप्रथम विभागाध्यक्ष डॉ ममता रानी ठाकुर ने आगत अतिथियों एवं विषय विशेषज्ञों का स्वागत किया। संगोष्ठी की संयोजिका प्रो लावण्य कीर्ति सिंह काब्या ने विषय प्रवेश किया तथा धन्यवाद ज्ञापन ललित कला संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो पुष्पम नारायण ने किया। संगोष्ठी में आनलाइन एवं आफलाइन लगभग देढ़ सौ प्रतिभागियों ने भाग लिया। संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान से हुआ ।

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