धर्म, दर्शन व ज्ञान की अविरल बही धारा
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मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है और मृत्यु या श्राद्ध भोजअपने पितरों के सम्मान में किया जाने वाला

सर्वोत्कृष्ट अनुष्ठान है। क्योंकि इसके माध्यम से ही हमारी पितरों को भोजन की प्राप्ति होती है । ये बातें गोवर्धन मठ- पुरी पीठाधीश्वर श्रीमद् गुरु शंकराचार्य श्री श्री 1008 निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने बृहस्पतिवार को टटुआर गांव में अरुण कुमार झा के दलान पर आयोजित धर्म दर्शन संगोष्ठी के दौरान अपने विचार रखते हुए कही। उन्होंने कहा कि मृत्यु भोज का विरोध करने वाले लोगों को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। उन्हें अपने ज्ञान का विकास करने की भी निहायत जरूरत है। उन्हें पाश्चात्य संस्कृति का पिछलग्गु बनकर निराधार अपना विचार थोपने की बजाय अपने गौरवशाली सनातन धर्म में निहित विचारों, सिद्धांतों एवं पुरातन समय से चली आ रही परंपराओं का अनुसरण करने की जरूरत है।
श्रीमद् गुरु शंकराचार्य ने अंतरजातीय विवाह के बढ़ते चलन पर निराशा व्यक्त करते कहा कि अंतरजातीय विवाह को संस्कृति या संस्कार कभी भी नहीं माना जा सकता। हां, इसे मैरिज शब्द भले दे सकते हैं लेकिन परिणय संस्कार में निहित भावों का निरूपण इसमें कदापि नहीं हो सकता। उन्होंने अंतरजातीय विवाह को शास्त्र विरूद्ध बताते कहा कि ऐसे विवाह में मैडम या वाइफ नामक प्राणी की प्राप्ति तो हो सकती है, लेकिन इसमें पत्नी का स्थान कथमपि प्राप्त नहीं हो सकता।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि यह परम सत्य है कि लोग आपको उसी समय तक याद करते हैं जब तक आपकी सांसें चलती हैं। इन सांसों के रुकते ही आपके क़रीबी रिश्तेदार, दोस्त और यहां तक की पत्नी भी दूर चली जाती है। सत्य को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कहा इसकी कोई भाषा नहीं होती। इसकी भाषा मनुष्य द्वारा बनाई गई है, लेकिन सत्य कभी भी मनुष्य का निर्माण नहीं हो सकता। इसे प्रमाणित करने के लिए किसी भाषा की जरूरत नहीं होती, बल्कि अंत: मन से इसे महसूस किया जाता है। उन्होंने कहा कि जब मन में सत्य जानने की जिज्ञासा पैदा हो जाती है तब दुनिया की बाहरी चीज़े अर्थहीन लगने लग जाती हैं। सत्य की बस इतनी ही परिभाषा है की जो सदा था, जो सदा है और जो सदा रहेगा।
भक्तों के सवाल का जवाब देते उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को यह ज्ञान होना चाहिए कि आत्मा एक राज़ा के समान होती है, जो शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धि से सर्वथा अलग होती है। उन्होंने कहा कि आत्मा इन सबका साक्षी स्वरुप है।
भक्तों की ओर से आये एक अन्य सवाल के जवाब मे उन्होंने कहा कि तीर्थ करने के लिए किसी जगह जाने की जरूरत नहीं है। सबसे बड़ा और अच्छा तीर्थ आपका स्वयं का मन है, जिसे विशिष्ट रूप से शुद्ध किया गया हो। उन्होंने कहा कि अज्ञानता के कारण आत्मा भले सीमित लगती हो लेकिन जब अज्ञान का अंधेरा मिट जाता है तब आत्मा के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हो जाता है। जैसे बादलों के हट जाने पर सूर्य दिखाई देने लगता है। उन्होंने कहा कि जिस तरह किसी दीपक को चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है। ठीक उसी तरह आत्मा को जो खुद ज्ञान का स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है।
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