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सड़क हादसों में महायुद्धों से अधिक मौतें, चौंकाते हैं भारत के आंकड़े: डा सुनील

सड़क हादसों में महायुद्धों से अधिक मौतें, चौंकाते हैं भारत के आंकड़े:डा सुनील

पथ निर्माण विभाग के कार्यपालक अभियंता एवं बिहार अभियन्त्रण सेवा संघ के महासचिव डा सुनील कुमार चौधरी ने अभियंताओ के एक बडे समूह को सम्बोधित करते हुए कहा कि सडक हादसो से होने वाले मौत के आकड़े चौकाने वाले हैं। उन्होने आगे कहा कि भारत के आज तक के युद्धों में जितने सैनिक शहीद नहीं हुए, उससे ज्यादा लोग सड़कों पर दुर्घटना में एक साल में मारे जाते हैं, इसलिए चिंतित सुप्रीम कोर्ट को यहां तक कहना पड़ा कि देश में इतने लोग सीमा पर या आतंकी हमले में नहीं मरते जितने सडकों पर गड्ढों की वजह से मर जाते हैं। पिछले एक दशक में ही भारत में लगभग 14 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए हैं।

उन्होंने आगे कहा कि विश्व सड़क सुरक्षा से संबंधित ब्रासिलिया घोषणा-पत्र में भारत ने सड़क दुर्घटनाओं में 2020 तक 50 प्रतिशत तक कमी लाने का संकल्प जताया था। जबकि सड़क दुर्घटनाओं के दौरान होने वाली मौतों में भी 2.37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हो गई।

देश में हर घंटे 18 लोग सड़क हादसों में जान गंवा रहे हैं जबकि 48 दुर्घटनाएं हर 60 मिनट में हो रही है।अधिकतर सड़क दुर्घटनाएं राष्ट्रीय राजमार्गों पर होती है । कुल दुर्घटनाओं का 30.2 प्रतिशत दुर्घटनाएं राष्ट्रीय राजमार्गों पर दर्ज की गई। जबकि ये सड़कें ग्रामीण सड़कों के मुकाबले ज्यादा चौड़ी एवं गड्ढा रहित होती हैं। भारत में सड़क दुर्घटना में मरने वालों की दर प्रति 100,000 पर 6 है। भारत में सड़क दुर्घटना में पिछले 10 सालों में 13,81,314 लोगों की मौत और 50,30,707 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। देश में हर 3.5 मिनट में एक व्यक्ति की मौत सड़क दुर्घटना में हो जाती है।

अकेली सरकार दोषी नहीं
सड़क दुर्घटनाओं के लिए सरकार और खराब सड़कों को देाष देना तो आसान है, मगर लोग इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से साफ बच निकलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में शहरीकरण की तीव्र दर, सुरक्षा के पर्याप्त उपायों का अभाव, नियमों को लागू करने में विलंब, नशीली दवाओं एवं शराब का सेवन कर वाहन चलाना, तेज गति से वाहन चलाते समय हेल्मेट और सीट-बेल्ट न पहनना आदि हैं।

डा चौधरी ने कहा कि सड़क हादसों में होने वाली कुल मौतों में 4 प्रतिशत शराब पीकर वाहन चलाने वालों की होती हैं। इसी प्रकार दुर्घटना में मरने पुरुषों की संख्या लगभग 86 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं की संख्या लगभग 14 प्रतिशत है। जाहिर है कि महिलाएं अधिक सावधानी से वाहन चलाती हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 64.4 प्रतिशत दुर्घटनाओं का कारण वाहनों की सीमा से अधिक गति रही है। जबकि सड़कों पर जहां तहां वाहन चालकों को गति सीमा में रहने के लिए सचेतक चिह्न और सावधानी बोर्ड लगे होते हैं। वाहन चलाना आए या न आए, लोग आरटीओ दफ्तरों में रिश्वत देकर लाइसेंस बनवा लेते हैं। इसी तरह नाबालिग बच्चों को चलाने के लिए वाहन थमा दिए जाते हैं, जिससे अन्य लोग भी बिना गलती किए दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार सड़क हादसों से होने वाली मौतों में चार पहिया वाले हल्के वाहनों के चालकों की मौतें 6 प्रतिशत, चार पहिया वाले हल्के पैसेंजर वाहनों के सवारों की 12 प्रतिशत, दो या तीन पहिया वाहन चालकों की सर्वाधिक 40 प्रतिशत, साइकिल चालकों की 2 प्रतिशत, पैदल चलने वालों की 10 प्रतिशत, भारी वाहन चालकों की 11 प्रतिशत, बस चालकों एवं पैसेंजरों की 7 प्रतिशत तथा अन्य की 13 प्रतिशत मौतें दर्ज हुई हैं। कुल मिलाकर मृत्यु दर प्रति लाख जनसंख्या पर 12 आंकी गई है।

इन तथ्यों के विश्लेषण से एक बात यह निकलकर सामने आती है, नियमों के निर्माण और जागरूकता सप्ताह का आयोजनभर इन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए काफी सिद्व नहीं होने वाला है, इसके लिए एक व्यापक निगरानी तंत्र की जरूरत है, जिससे नियमों को सही दिशा में क्रियान्वयन हो सके, और युवा और परिवारजनों को भी जागरूकता दिखानी होगी, तभी देश में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं से निजात मिल सकती है। नीति के निर्माण से कार्य सफल नहीं होता है, उसके सफल कार्यान्वयन से ही सफलता अर्जित की जा सकती।

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