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दरभंगा सी एम कॉलेज संस्कृत भारत की आत्मा,जिसके बिना भारत का पूर्ण उत्थान असंभव-डा जयशंकर

सी एम कॉलेज के संस्कृत विभाग के तत्वावधान में संचालित 10 दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर संपन्न

समाज व सरकार के सकारात्मक सहयोग से होगा संस्कृत का सर्वविध विकास- प्रो जीवानन्द

संस्कृत देववाणी ही नहीं,बल्कि जनवाणी भी है- प्रो विश्वनाथ

संस्कृत भारत की आत्मा,जिसके बिना भारत का पूर्ण उत्थान असंभव-डा जयशंकर

संस्कृत सदा से ही समाज व राष्ट्र का सबसे बड़ा मार्गदर्शक- डा रमेश

संस्कृत संभाषण की तकनीक सर्वोत्तम,सीखने हेतु सार्थक प्रयास की जरूरत- प्रो इंदिरा

 

Edit ;- by ajit kumar singh

संस्कृत विभाग की ओर से सभी प्रतिभागियों को प्रदान किया गया प्रमाण पत्र
संस्कृत सर्वाधिक प्राचीन,समृद्ध एवं वैज्ञानिक भाषा है,जिसका अध्ययन करने से मानव का संपूर्ण विकास होता है।समाज तथा सरकार के सकारात्मक सहयोग से संस्कृत का सर्वविध विकास हो रहा है।संस्कृत की सहायता से ही हम अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकते हैं।उक्त बातें विश्वविद्यालय संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो जीवानंद ने सी एम कॉलेज,दरभंगा के संस्कृत विभाग के तत्वावधान में चल रहे दस दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में कहा।उन्होंने कहा कि आज सबों को संस्कृत भाषा पढ़ने और बोलने की जरूरत है।
सारस्वत अतिथि के रूप में संस्कृत के वरीय प्राध्यापक डा जयशंकर झा ने कहा कि मेरे लिए परम हर्ष की बात है कि सी एम कॉलेज का संस्कृत विभाग सफल संभाषण शिविर का आयोजन किया है,जिससे प्रतिभागियों के जीवन में कई सकारात्मक प्रभाव अवश्य आयेगा। संस्कृत भारत की आत्मा है,जिसके बिना देश का पूर्ण उदय संभव नहीं है।संस्कृत के अध्ययन के बिना भारत को सम्यक् रूप में नहीं जाना जा सकता है।संस्कृत अमृत से भी मधुर भाषा है,जिसके द्वारा संवेदनशील समाज का निर्माण संभव है।
विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा के विभाग के उपनिदेशक डा अवधेश कुमार झा ने कहा कि आज संस्कृत पठन-पाठन की व्यापक सुविधा उपलब्ध है।अपने पर विश्वास रखकर संकल्प लेने की जरूरत है।छात्र हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हुए कभी न घबराए। समस्या तो आएंगी ही,पर हमें दोनों स्थितियों में सहज व सरल रहना चाहिए।मिथिला वरद पुत्रों की स्थली है।
मुख्य वक्ता के रूप में संस्कृत भारती के प्रदेश महामंत्री डा रमेश झा ने कहा कि मनुष्य को संस्कारित तथा मानवोचित गुणों से युक्त करने में संस्कृत का अत्यधिक योगदान है।यह हमें संवेदनशील तथा नरोत्तम बनाता है।संस्कृत-विद्या से ही मानव की मुक्ति संभव है।संस्कृत सदा से ही समाज का मार्गदर्शन करता रहा है।सिर्फ संस्कृत में ही पूरे विश्व की शांति व कल्याण की कामना की गई है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रो विश्वनाथ झा ने कहा कि संस्कृत सिर्फ देववाणी ही नहीं बल्कि जनवाणी की क्षमता रखती है।आज के दौर में संस्कृत अर्थकरी विद्या है जो रोजगारोन्मुख भी है। संस्कृत का विद्यार्थी कभी भी,कहीं भी बेरोजगार नहीं रख सकता है।गीता दुनिया में प्रबंधन का अद्वितीय ग्रंथ है,जिसमें जीवन की सभी समस्याओं के निदान उल्लिखित हैं। संस्कृत हममें अपना व पराया का भेद मिटाता है।यह शिविर हमारा प्रथम प्रयास है जो अनवरत जारी रहेगा।बस लोगों को इसी तरह जोड़ने की जरूरत है। प्रो इंदिरा झा ने कहा कि संस्कृत संभाषण की तकनीक सर्वोत्तम है।बस हमें सीखने हेतु सार्थक प्रयास करने की जरूरत है।मिथिला ज्ञान की धरती है,जहां संस्कृत फला-फूला है।पूरे भारतवर्ष को अखंड बनाने में संस्कृत का काफी योगदान रहा है।
समापन समारोह में डा प्रीति कनोडिया,प्रो विकास कुमार,प्रो संजीव कुमार,डा अभिलाषा कुमारी,प्रो रागिनी कुमारी,प्रो अखिलेश कुमार राठौर,अमरजीत कुमार,पूजा कुमारी,जयशंकर झा, संतोष कुमार,जयप्रकाश झा, बालकृष्ण कुमार सिंह,प्रणव कुमार,बाबू साहब,दशरथ ठाकुर, शिवानी कुमारी,गिरधारी कुमार झा,सपना कुमारी,सौरभ कुमार झा,कृष्ण मोहन भगत,विकास कुमार गिरि,लक्ष्मी कुमारी,कुसुम कुमारी,निशु कुमारी आदि ने भी अपने शिविर अनुभव बताए।कार्यक्रम का प्रारंभ प्रो इंदिरा झा के नेतृत्व में राष्ट्रगान- जन गण मन—के सामूहिक गायन से हुआ।अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ,स्मृति फूलमाला तथा चादर से किया गया। सभी 80 प्रतिभागियों को महाविद्यालय के संस्कृत विभाग की ओर से प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।शिविर संचालिका अंशु कुमारी के संचालन में आयोजित समापन समारोह में अतिथियों का स्वागत शिविर संयोजक डा संजीत कुमार झा ने किया,जबकि धन्यवाद ज्ञापन संस्कृत विभागाध्यक्ष डा आर एन चौरसिया ने किया। शिविर के अंत में डा संजीत कुमार झा के नेतृत्व में सामूहिक शांति पाठ किया गया।

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