प्रेमचंद की 141वीं जयंती के उपलक्ष्य में विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा तथा प्रेमचंद जयंती समारोह समिति, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद के लेखन की प्रासंगिकता’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी का उद्घाटन मुख्य अतिथि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के माननीय कुलपति प्रो० सुरेंद्र प्रताप सिंह ने किया। सर्वप्रथम माननीय कुलपति महोदय एवं आगत अतिथियों का हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो० राजेन्द्र साह ने हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया|इस संगोष्ठी में अतिथि के रूप में आगत राजनीति विज्ञान विभाग, ल० ना० मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के प्राचार्य मुनेश्वर यादव और मैथिली विभाग के प्राचार्य नारायण झा शामिल हुए।
अपने उद्घाटन उद्बोधन में माननीय कुलपति महोदय ने अमर कथाकार प्रेमचंद की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए उनके साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद को सिर्फ छप्पन वर्ष की ही आयु मिली थी लेकिन उन्होंने जिस सच्चाई से साहित्य का सृजन किया वह अपने आप में अभूतपूर्व है। कथा-साहित्य में उनका योगदान अन्यतम है। उन्होंने कहा कि यह सर्वविदित है कि जितनी फिल्में प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों पर बनीं,उतनी शायद ही भविष्य के किसी कथाकार पर बनीं। आज जरूरत है प्रेमचंद की कहानियों में छिपे संदेशों को अपने जीवन में उतारने की। प्रेमचंद की कई कहानियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने ‘नमक का दरोगा’ पर विशेष प्रकाश डाला। इस कहानी में चित्रित आदर्शवाद को उन्होंने विशेष रूप से व्याख्यायित किया|
विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र साह ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य इतना व्यापक है कि बहुत कुछ कहने के बाद भी ऐसा लगता है कि बहुत कुछ छूट गया। सच मायने में प्रेमचंद साहित्य के सच्चे साधक थे। वे अंतिम वक्त तक साहित्य से जुड़े रहे और यही उन्हें सच्चा साधक बनाता है। अभावों में भी उनकी कलम नहीं रुकी। उन्होंने शोषितों के पक्ष में आजीवन लिखा।वस्तुत: प्रेमचंद मूक जनता की आवाज थे| उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का समग्र साहित्य अनुभवजन्य है|यही कारण है कि उसमें विश्वसनीयता, आत्मीयता, प्रभावशालिता तथा शाश्वतता विद्यमान है|
प्रेमचन्द जयंती समारोह, दरभंगा के अध्यक्ष डॉ० धर्मेन्द्र कुँवर ने प्रेमचंद को नमन करते हुए कहा समकालीन विश्व व्यवस्था के कारण सम्पूर्ण संसार महाजनी सभ्यता में आकंठ डूबा हुआ है। भोग की संस्कृति और उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है। निर्धनता के कारण भारतीय किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। पितृसत्तात्मकता आज भी समाज में अपनी जड़ें जमाये हुए है। जातिवाद और सम्प्रदायवाद ने आज सम्पूर्ण राष्ट्र को उन्मादित कर दिया है। उन्होंने कहा कि आज की यह सभा आंदोलनरत किसानों को नैतिक समर्थन देती है। प्रेमचंद की कथाओं को कालजयी और शाश्वत बताते हुए उन्होंने कहा कि उस समय जो मूल समस्याएं थीं वह आज भी व्याप्त हैं। इन समस्याओं के निराकरण के वास्ते प्रेरणा के रूप में प्रेमचंद की ओर मुखातिब होना वक्त की मांग है| 1936 में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद ने कहा कि साहित्य को राजनीति से आगे चलने वाली मशाल बनाना चाहिए, जिसमें राजनीति अपनी राह ढूंढ सके। उन्होंने युवाओं को प्रेमचंद के द्वारा जलाई गयी मशाल में अपनी राह तलाशने को कहा।
विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ० चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने ‘प्रेमचंद जयंती समारोह समिति, दरभंगा’ की प्रशंसा करते हुए कहा कि दरभंगा में प्रेमचंद से सम्बंधित यह एकमात्र संस्था है। उन्होंने प्रेमचंद की तुलसीदास से तुलना करते हुए कहा कि तुलसीदास के बाद सबसे ज्यादा प्रेमचंद को ही भारतीय महाद्वीप में पढा गया है। भारतीय नवजागरण और हिंदी नवजागरण के प्रतिनिधि लेखक प्रेमचंद हैं। किसान, मजदूर और मध्य वर्ग के बीच से प्रेमचंद की कहानियां प्रस्फुटित हुई हैं। उन्होंने आगे कहा कि एकतरफ वे अंग्रेजी राज से आजादी तो चाहते ही थे लेकिन दूसरी तरफ वे भारतीय नवाबों, शोषकों, जमींदारों, साहूकारों आदि से भी छुटकारा पाना चाहते थे। प्रो० सिंह ने कहा कि प्रेमचंद ने लगातार वैचारिक यात्रा की है| भारतीय किसानों-मजदूरों की त्रासदी को प्रेमचंद उत्कर्ष पर ले जाते हैं |उन्होंने प्रेमचंद को भविष्यद्रष्टा बताया। उन्होंने कहा कि वे मुक्कमल आजादी चाहते थे,जहाँ समतामूलक समाज की स्थापना हो। उन्होंने अपनी कथाओं में यह पहले ही लिख दिया था कि जब अंग्रेजी राज समाप्त हो जाएगा तो देसी अंग्रेज भी दोनों हाथों से गरीबों, मजदूरों, शोषितों और दलितों को लूटेंगे।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल राजनीति विज्ञान विभाग के प्राचार्य प्रो० मुनेश्वर यादव ने प्रेमचंद को सच्चाई का रहस्योद्घाटन करने वाला साहित्यकार बताया। नव उपनिवेशवाद और नव मार्क्सवाद के इस दौर में कैसे दुनिया बदल गयी है उस पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि आज हमारे अस्तित्व पर ही संकट के बादल छाए हैं लेकिन आज इस पर कहीं कोई चिंतन नहीं दीखता। वाणी को विराम देते हुए उन्होंने प्रेमचंद को श्रद्धांजलि अर्पित की।
प्रेमचंद जयंती समारोह समिति के उपाध्यक्ष हरिकृष्ण सहनीजी ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में दलित और नारी के प्रश्न उभर कर आये हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद न केवल एक लेखके हैं बल्कि स्वयं में ही एक आंदोलन हैं। उन्होंने बीच में चले उस आंदोलन की ओर भी इशारा किया जिसमें प्रेमचंद को ‘दलित-विरोधी’ घोषित किया गया था पर उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जो प्रेमचंद को नहीं समझ सके वे ही उन्हें ‘दलित-विरोधी’ कहते हैं।
विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के प्राचार्य डॉ० विजय कुमार ने कहा कि मैं कृषक परिवार से आया हूँ और आज प्रेमचंद को याद करते हुए मैं उन किसानों को भी याद करना चाहता हूँ जो पिछले आठ महीनों से आंदोलनरत हैं। ‘गोदान’ की कथावस्तु पर प्रकाश डालते हुए उन्हेंने किसान के मजदूर बनने की त्रासदी पर विचार रखे। उन्होंने सभा में उपस्थित सभी बुद्धिजीवियों के समक्ष यह प्रश्न रखा कि क्या आज हम यह कह सकते हैं कि हम उन किसानों के प्रति सहानुभूति रखते हैं जो पिछले आठ महीनों से आंदोलनरत हैं? अगर यह कहने की सामर्थ्य हम सब में है तो यही प्रेमचंद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कार्यक्रम में उपस्थित सी०एम० कॉलेज हिंदी विभाग के अध्यक्ष श्री अखिलेश कुमार राठौड़ ने कहा कि आदर्शवाद और यथार्थवाद का पूर्ण सामंजस्य प्रेमचंद की कथाओं में मिलता है। जयशंकर प्रसाद की जो ‘चिंता’ है उसे प्रेमचंद ने जिया है। ‘नमक का दारोगा’ से ‘कफन’ तक के सफर में प्रेमचंद की कथादृष्टि जैसे बदली है वह पाठक को उत्तेजित करती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की पंक्तियों में रस का पूर्ण परिपाक देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद हमारी दृष्टि में न केवल एक साहित्यकार हैं अपितु वे हमारे हृदय में कार्ल मार्क्स जैसे राजनीतिज्ञ के रूप में विराजमान हैं। समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति से लेकर समाज के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति तक सब ही प्रेमचंद को पढ़ते हैं। ‘गोदान’ के मालती-मेहता प्रसंग की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि इस प्रसंग को पढ़ते हुए कई बार इस प्रसंग को पढ़ते हुए रोया भी हूँ और अंधेरी रातों में अकेले बैठ कर हँसा भी हूँ।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रेमचंद जयंती समारोह समिति के सचिव डॉ० लाल कुमार ने कहा कि आज देश कई समस्याओं से एकसाथ जूझ रहा है। किसानों के आंदोलन और शिक्षा के निजीकरण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेमचंद ने ये चीजें दशकों पहले देख ली थीं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने एक सपना देखा था कि देश में वैसे समतामूलक समाज की स्थापना हो जहाँ कोई भी भूखा न सोए, जहाँ अस्पृश्यता की बू न आये। समाज के लिए प्रेमचंद निरन्तर लिखते रहे, जब अंग्रेजों ने ‘सोजेवतन’ की प्रतियों को सीज कर लिया तब भी प्रेमचंद नहीं रुके और न उनकी कलम रुकी।
धन्यवाद ज्ञापन के दौरान विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक श्री अखिलेश कुमार ने कहा कि प्रेमचंद मानवीय संवेदना के कथाकार हैं। वे अपने पात्रों को हमारे समक्ष इस तरह उपस्थित करते हैं जैसे वे बिल्कुल हमारे बीच के हों या हम ही हों। प्रेमचंद की भाषा बिल्कुल सामान्य जन की भाषा है। प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में प्रेमचंद ने साहित्यिक भाषा पर भी चर्चा की थी। उन्होंने कहा कि साहित्यकार वस्तुतः कालजयी पत्रकर होता है। उन्होंने कहा कि आज शोषण का सिर्फ स्वरूप बदल गया है लेकिन शोषक आज भी वहीं हैं जो प्रेमचंद के समय में थे। उन्होंने कहा कि 1908 में राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाकर ‘सोजेवतन’ को सीज कर लिया गया था क्योंकि उसमें भ्रष्टाचार, नारी शोषण आदि पर यथार्थ ढंग से लिखा गया था। उन्होंने संगोष्ठी में शामिल सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।
इस संगोष्ठी में विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के कनीय शोधप्रज्ञ कृष्णा अनुराग, अभिशेक कुमार सिन्हा, धर्मेन्द्र दास, शोधार्थी दुर्गानन्द ठाकुर, ज्योति कुमारी सहित बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे। प्रेमचंद जयंती समारोह समिति के संयुक्त सचिव मुजाहिद आजम, रूसो सेन गुप्ता, मनोज कुमार, हरेराम राज, राम प्रताप आदि भी उपस्थित रहे।
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