श्री विधि अपनाने से जिले की 1.5 लाख जीविका दीदियों को हो रहा है फायदा
कम वर्षापात में वरदान साबित हो रही श्री विधि, जीविका दीदियों की बढ़ी उपज
श्री विधि से खेती कर रही जीविका दीदियों को मिल रही है आर्थिक मजबूती
1.5 लाख से अधिक जीविका दीदियों ने अपनाई श्री विधि, कम संसाधनों में अधिक उत्पादन
श्री विधि से खेती में क्रांति, जीविका दीदियों की बदली जिंदगी

बिहार के दरभंगा जिला की कृषि भूमि की समृद्धि और यहाँ के लोगों की जीवनशैली में खेती एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस जिले के लोग मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं, और हाल के वर्षों में जीविका जैसे कार्यक्रमों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार लाने में मदद की है। जीविका किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों और विधियों पर प्रशिक्षण प्रदान करती है। इसी क्रम में जीविका दीदियों को “श्री विधि” तकनीक से खेती करने के लिए विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। जिला अंतर्गत कृषि व्यवसाय से जुड़ी डेढ़ लाख से अधिक जीविका दीदियों ने इस विधि को अपनाकर अपनी उपज को कई गुणा बढ़ाया है साथ ही फसलों की गुणवत्ता में भी बढ़ोतरी की है। अफ्रीकी देश मेडागास्कर में 1983 में फादर हेनरी डी लाउलेनी ने इस तकनीक का आविष्कार किया था। धान उत्पादन की यह एक ऐसी तकनीक है जिसके दवारा पानी के बहुत कम प्रयोग से ही धान की बहुत अच्छी उपज ली जा सकती है, जहां पारंपरिक तकनीक में धान के पौधों को पानी से लबालब भरे खेतों में उगाया जाता है, वहीं मेडागास्कर तकनीक में पौधों की जड़ों में नमी बरकरार रखना ही पर्याप्त होता है, लेकिन सिंचाई का उचित प्रबंध होना जरूरी है, ताकि जरूरत पड़ने पर फसल की सिंचाई की जा सके। इस विधि में सामान्य तौर से जमीन पर दरारें पड़ने के बाद ही सिंचाई करनी होती है। इस तकनीक से धान की खेती में भूमि, श्रम, पूंजी और पानी की तो बचत होती ही है, वहीं उत्पादन भी कई गुना तक ज्यादा मिलता है।
जीविका की डीपीएम डा० ऋचा गार्गी ने कहा “श्री” विधि से धान की खेती के लिए किसान को तकनीकी रूप से दक्ष एवं कुशल प्रबंधक बनना जरूरी है, खेती से जुड़े परिवारों के लिए यह एक नया अवसर बनकर उभरी है। उन्होंने कहा कि एक किसान परम्परागत तरीके की खेती से एक एकड़ में 20 से 25 मन तक ही धान की उपज प्राप्त कर सकते हैं वहीं “श्री” विधि से धान की खेती करने पर उतनी ही जमीन पर 40 से 50 मन धान की पैदावार होती है। इस तकनीक से खेती में पानी की जरूरत कम होती है और 25 से 30 प्रतिशत तक सिंचाई जल की बचत भी होती है। धान की खरीफ और गरमा फसलों की खेती में इस विधि का सफलतापूर्वक प्रयोग कर सकते हैं। रोपा वाले सभी खेतों में इस विधि को अपनाया जा सकता है। जिससे रोपाई में बीज की 80 प्रतिशत बचत होती है। हर किसान जो धान की खेती करता है वह इस विधि से खेती कर ज्यादा लाभ प्राप्त कर सकता है। धान की खरीफ और गरमा फसलों की खेती में इस विधि का सफलतापूर्वक प्रयोग कर सकते हैं। इस विधि में समतल खेतों और उचित जल प्रबंधन के कारण, धान की फसल अधिक मात्रा में और गुणवत्ता में बेहतर होती है। धान की फसल की गुणवत्ता में सुधार होता है, जिससे बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं।
कृषि एवं जीविकोपार्जन प्रबंधक मनोरमा मिश्रा ने तकनीकी जानकारी देते हुए बताया कि ‘श्री’ विधि से धान की खेती के लिए 12 दिन की उम्र का बिचड़ा से रोपाई करते हैं, 10 इंच की दूरी पर एक-एक बिचड़ा कतार में लगाते हैं। एक एकड़ जमीन के बिचड़े के लिए 2 किलो बीज की जरूरत होती है। कम से कम दो बार वीडर (कोनोवीडर) से खरपतवारनिकालना जरूरी होता है। एक बिचड़े में 40 से 45 कल्ले निकलते हैं।
बहादुरपुर प्रखण्ड के सरस्वती जीविका समूह की उषा दीदी ने बताया पहले जहां पहले उन्हें 50 से 60 किलो धान भी बामुश्किल ही उपज मिल पाता था वहीं जीविका द्वारा बताए गए विधि से खेती करने से अब उतनी ही जमीं पर 110 से 120 किलो तक धान की उपज हो रही है और पहले की तरह अधिक सिंचाई करने की समस्या से भी निजात मिला है और अच्छी फसल से अधिक मुनाफा भी हो रहा है।
संचार प्रबंधक राजा सागर ने कहा दरभंगा जिले के किसान अब जीविका के समर्थन से अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर हो रहें हैं। आधुनिक कृषि तकनीकों, आवश्यक संसाधनों, वित्तीय सहायता और सामुदायिक सस्थाओं के माध्यम से, वे अपनी फसल उत्पादन क्षमता को बढ़ा रहे हैं और अधिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं। जीविका के द्वारा खेती के लिए आवश्यक उपकरण और मशीनरी जैसे ट्रैक्टर, रोटावेटर,और अन्य कृषि यंत्र भी सस्ते दरों पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जीविका का यह योगदान न केवल कृषि क्षेत्र की उन्नति में सहायक है बल्कि किसानों के जीवन स्तर को भी सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
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