पालि और संस्कृत के अंतर्संबंधों पर मारवाड़ी महाविद्यालय में प्रो. उमा शंकर व्यास का व्याख्यान

मारवाड़ी महाविद्यालय, दरभंगा के संस्कृत विभाग द्वारा एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया, जिसमें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रो. उमा शंकर व्यास ने पालि और संस्कृत के गहरे संबंधों पर प्रकाश डाला। नव नालंदा महाविहार के पूर्व निदेशक और पालि-हिन्दी शब्दकोश के संपादक प्रो. व्यास ने बताया कि संस्कृत और पालि भारतीय भाषाई परंपरा की दो महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं। संस्कृत वेदों, उपनिषदों और महाकाव्यों की भाषा रही है, जबकि पालि मुख्य रूप से बौद्ध ग्रंथों की भाषा है। पालि, संस्कृत से विकसित एक प्राकृत भाषा मानी जाती है, जिस पर संस्कृत का व्यापक प्रभाव देखा जाता है।
उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से ध्वनि परिवर्तन, शब्दावली और व्याकरणिक संरचना में संस्कृत के प्रभाव को स्पष्ट किया। संस्कृत के ‘धर्म’ से पालि में ‘धम्म’ और ‘ज्ञान’ से ‘ञाण’ जैसे शब्द परिवर्तित हुए। पालि की व्याकरणिक संरचना अपेक्षाकृत सरल है और इसमें संधियों की जटिलता कम है। प्रो. व्यास ने महाबोधिवंस, तेलकटाहहगाथा, दाठावंस, जिनालंकार आदि ग्रंथों के आधार पर सिद्ध किया कि संस्कृत कैसे पालि को प्रभावित करती है।
कार्यक्रम के संयोजक सह संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ विकास सिंह ने कहा कि संस्कृत और पालि दोनों ही प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ हैं, जिनका पारस्परिक प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। संस्कृत वैदिक काल से ही प्रतिष्ठित भाषा रही, जबकि पालि मुख्यतः बौद्ध धर्म की भाषा के रूप में विकसित हुई। बौद्धों ने परवर्ती काल में अपने अध्ययन अध्यापन की भाषा संस्कृत को बना लिया था।
पालि पर संस्कृत का प्रभाव व्याकरण, शब्दावली और शैली में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, संस्कृत शब्द ‘धर्म’ पालि में ‘धम्म’ बन जाता है, तथा ‘क्षेत्र’ शब्द ‘खेत’ के रूप में परिवर्तित हो जाता है। संस्कृत में समासों का व्यापक प्रयोग होता है, जबकि पालि में सरल रूप में शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
व्याख्यान में स्वागत भाषण हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ अनुरुद्ध सिंह ने एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ रवि कुमार राम ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रधानाचार्य डॉ विनोद बैठा ने करते हुए कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों से न केवल ज्ञान वृद्धि होती है अपितु सांस्कृतिक चेतना का जन्म होता है। संस्कृत और पालि दोनों ही भारत की सांस्कृतिक भाषाएं हैं।
इस व्याख्यान में श्रीलंका से भंते एम. बुद्धानंद, थाईलैंड से भंते दीपरतन, बर्मा से भंते डॉ अरियवंस थेरो, जापान से भंते रवि मेधांकर महाथेरो, दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ सुष्मिता व्यास, डॉ अमित कुमार पाण्डेय, धम्म रतन, अमन कुमार चौधरी, आदित्य कुमार मिश्र, मेधा कोशिकी, राणा सिंह, रोहिणी, ज्योति आदि उपस्थित थे।
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