• अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर शिक्षाशास्त्र विभाग की एनएसएस इकाई द्वारा समारोह आयोजित…
• महिलाएं घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न तथा संविधान प्रदत्त अपने अधिकारों के लिए आगे आए- प्रो मंजू राय
• महिलाएं हमारी सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कारों की वाहिका, सतत एवं संतुलित विकास के लिए महिला सशक्तिकरण जरूरी- डॉ चौरसिया
• महिलाओं की शिक्षा, सम्मान, समानता एवं न्याय से ही समाज का वास्तविक कल्याण संभव- डॉ प्रियंका राय

भारतीय संविधान ने महिलाओं को बहुत अधिकार दिया है। आज नारी बेचारी नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी बने तथा कठिन परिस्थिति में भी आत्मविश्वास रखते हुए अपनी इच्छा से जिए न कि दूसरों को खुश करने के लिए। महिलाएं किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा तथा कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न के प्रति मुखर होकर अपने अधिकार के लिए आगे आए। उक्त बातें पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो मंजू राय ने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के अंतर्गत संचालित शिक्षाशास्त्र विभाग (नियमित) की एनएसएस इकाई द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस- 2026 की पूर्व संध्या पर आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में कही। उन्होंने कहा कि समाज में प्रचलित पितृसत्तात्मक सोच को बदलने की जरूरत है। माता-पिता अपने बेटे एवं बेटियों के लिए समान भाव एवं अवसर दें और बेटी भी खुद को सुयोग्य बनाए। आज महिलाएं घर और बाहर मल्टीटास्क रोल निभा रही है। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ एपीजे अब्दुल कलाम डब्ल्यूआईटी, दरभंगा की सहायक कुलसचिव डॉ प्रियंका राय ने कहा कि शिक्षा, संघर्ष, साहस और समर्पण से महिलाएं न केवल अपने परिवार, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र को समृद्ध कर रही है। वे स्नेह, दया, करुणा, ममता रूपी मानवीय चेतना की प्रतिमूर्ति हैं। स्त्री जीवन का सृजन कर उसे पोषित एवं नैतिक संवेदना से जीवंत करती है। गांधी ने कहा था कि यदि समाज की वास्तविक समृद्धि को देखना हो तो महिलाओं की स्थिति को देखें। उन्होंने कहा कि नारी की शिक्षा, सम्मान, समानता और न्याय से ही समाज का कल्याण संभव है।
मुख्य वक्ता के रूप में एनएसएस के विश्वविद्यालय समन्वयक डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि महिला एवं पुरुष परिवार एवं समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए के समान हैं। समृद्धि एवं खुशहाली के लिए उनमें समान गति एवं संतुलन अनिवार्य है। वे हमारी सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कारों की वाहिका हैं। सतत एवं संतुलित विकास के लिए महिला सशक्तिकरण जरूरी है। उन्होंने महिला के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि 2047 के विकसित भारत निर्माण तथा विश्वगुरु बनने में उनका सर्वाधिक योगदान हो रहा है। पुरुषों एवं महिलाओं में वास्तविक समानता लाने हेतु हमें अपने घर से शुरुआत करनी होगी। यद्यपि काल एवं परिस्थिति के कारण महिलाएं प्रतिबंध की गई, परंतु 21वीं शताब्दी महिलाओं का ही होने वाला है।
अध्यक्षीय संबोधन में विभागाध्यक्ष डॉ अरविन्द कुमार मिलन ने कहा कि हमें महिलाओं के प्रति अपनी सोच एवं कर्म बदलने की जरूरत है। यदि उन्हें निर्णय करने एवं कार्य करने का समान अवसर एवं अधिकार मिले तो निश्चय ही हमारा समाज एवं राष्ट्र और आगे बढ़ेगा। हमें महिलाओं को सर्वत्र सम्मान एवं अवसर देना होगा। उन्होंने कहा कि हमारा विभाग द्वारा यथासंभव सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है, ताकि वे घर जैसा महसूस कर सकें। नई पीढ़ी को वक्ताओं के अनुभव एवं ज्ञान को अपनाने की जरूरत है।
समारोह का उद्घाटन दीप प्रज्वलन से हुआ, जबकि अतिथियों का सम्मान पाग, चादर एवं बुके से किया गया। अंजलि एवं शुभ्रकीर्ति के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में स्वागत गान दीपा, स्तुति, खुशी एवं अल्पना ने प्रस्तुत किया। स्वागत संबोधन शिक्षिका डॉ निधि वत्स ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन एनएसएस पदाधिकारी डॉ उदय कुमार ने किया। इस अवसर पर डॉ अखिलेश कुमार मिश्रा, डॉ शंभू प्रसाद, डॉ शुभ्रा, डॉ स्वर्णरेखा, डॉ शगुफ्ता, डॉ जयशंकर, डॉ रेशमा तबस्सुम, डॉ मिर्जा राहुल्ला बेग, गोविंद कुमार तथा आनंद मोहन आदि सहित 125 से अधिक छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे, जिनमें विशाल, राजा कुमार, अदिति, अनुपम, समरेश कुमार, खुशी, नेहा, लक्ष्मी कुमारी तथा तहज्जुन आदि ने महिला उत्थान संबंधी गीत, नृत्य, कविता पाठ एवं भाषण प्रस्तुत किया।
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