दरभंगा वट सावित्री पूजा को लेकर आज सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए महिलाओं ने वट सावित्री का पूजन अपने पति की लंबी आयु के लिए किया।

यह व्रत प्रत्येक साल करती हैं। और भगवान से मनोकामना करती हैं कि सुखी परिवार रहे। त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान भारद्वाज ऋषि के आश्रम में गए थे। उनकी यहां विश्राम की व्यवस्था वटवृक्ष के नीचे किया गया था। दूसरे दिन प्रात: भारद्वाज ऋषि ने भगवान श्रीराम को यमुना की पूजा के साथ-साथ बरगद की पूजा करके आशीर्वाद लेने का उपदेश दिया था।बाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के पांच में सर्ग में सीता जी ने भी श्याम वट की प्रार्थना करके जंगल के प्रतिकूल आधातो से रक्षा की यात्रा किया था। आयुर्वेद के अनुसार वटवृक्ष का औषधीय महत्व है। सावित्री व्रत जेस्ट कृष्ण अमावस्या तदनुसार वट सावित्री व्रत महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए रखती है इस व्रत में जेस्ट कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक 3 दिन का उपवास रखा जाता है और कुछ स्थानों पर मात्र 1 दिन उपवास को ही उपवास होता है श्री भागवत के दशम स्कंध के 18वें अध्याय के अनुसार कंस का दूध प्रबला सुर गोकुल को भस्म करने के लिए इसी जेष्ठ मास में भेष बदलकर आया था श्री कृष्ण ग्वाल बालों के संग खेल रहे थे श्री कृष्ण उसे पहचान लेते और वे अपने साथियों के साथ जिस पेड़ की मदद लेते हैं वह बरगद का पेड़ था जिसका नाम भांडी था श्रीकृष्ण की रक्षा इस बरगद के पेड़ ने की थी वनस्पति विज्ञान की एक रिसर्च के अनुसार सूर्य की ऊष्मा का 27% हिस्सा बरगद का वृक्ष सूचित कर उसने अपनी नवमी मिलाकर उसे पुनः आकाश में लौटा देता है जिससे बादल बनता है और वर्षा होती है वटवृक्ष द्वारा दिन-रात प्राण वायु आक्सीजन प्रदान किया करते हैं वट वृक्ष प्रकृति से तालमेल बिठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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