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बुद्ध का आदर्श जीवन, व्यावहारिक शिक्षाएं तथा कल्याणकारी दर्शन मानव का सदा पथ-प्रदर्शक- डा चौरसिया

‘लोक में बुद्ध और बौद्ध संस्कृति’ विषयक राष्ट्रीय वेबीनार में दरभंगा के कई शिक्षकों की सहभागिता

डा विकास सिंह,डा आर एन चौरसिया ने किया पत्र वाचन,जबकि डा विनोद बैठा तथा डा ममता स्नेही की हुई सहभागिता

बुद्ध का आदर्श जीवन, व्यावहारिक शिक्षाएं तथा कल्याणकारी दर्शन मानव का सदा पथ-प्रदर्शक- डा चौरसिया
राष्ट्रीय वेबीनार में सी एम कॉलेज, दरभंगा के संस्कृत विभागाध्यक्ष डा आर एन चौरसिया ने भगवान बुद्ध की पंचशील और अष्टांग मार्ग की शिक्षाओं के माध्यम से लोक में बुध के प्रभाव का विशद् विश्लेषण करते कहा कि बुद्ध का आदर्श जीवन,व्यावहारिक शिक्षा तथा कल्याणकारी दर्शन मानव का सदा पथ-प्रदर्शक रहा है। यदि हम बुद्ध के संदेशों को जीवन में अपनाएं तो हमारी जिंदगी लाफिंग बुद्धा की तरह ही उठेगी। बुद्ध का मध्य मार्ग सदा श्रेयस्कर है जो हमें स्वयं पर विजयी होना सिखाती है। बुद्ध ने हमें आत्मसंयम और अनुशासन की पद्धति से व्यक्तित्व व चरित्र निर्माण सीखाया,जिसका मुख्य उद्देश अपनि सरल जीवन में करुणा,प्रेम-भाव व सहयोग आदि सद्गुणों को अपनाना है। आज बुद्ध शांति,समानता और अहिंसा के विश्वदेव माने जाते हैं।
राष्ट्रीय वेबीनार में मारवाड़ी महाविद्यालय,दरभंगा के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ विकास सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए त्रिविध पावनी बुद्ध पूर्णिमा के अर्थ को स्पष्ट करते हुए लोक में बुध और बौद्ध संस्कृति के विविध स्वरूपों तथा उन्होंने जन-जन तक पहुंचे बुध की शिक्षा के तहत लिखे जा रहे विभिन्न शोध आलेखों तथा पुस्तकों की ओर प्रतिभागियों का ध्यान आकृष्ट किया। डॉ विकास ने बुद्ध के मध्यम कल्याणकारी मार्ग को श्रेयस्कर बताते हुए उनके उपदेशों को अपने जीवन में उतारने को वर्तमान में लाभदायक बताया तथा उनके जीवन दर्शन को सार्वजनिक और सर्वकालिक रूप में स्वीकार किया।
गूगल मीट के माध्यम से आयोजित वेबिनार को उद्घाटन और तकनीकी दो सत्रों में विभाजित किया गया,जिसमें डॉ. विशम्भरनाथ प्रजापति,डॉ. इन्दु डिमोलिया,डॉ माई राम,डॉ सत्य मुदिता स्नेही,सोनल बैरवा,डा विनोद बैठा,दीपिका नेगी,मुकेश कुमार,हार्दिक सिंह,डॉ आर एन चौरसिया,पूर्व विधायक माननीय पोकर लाल परिहार,प्रो बी आर बामणिया,अरविन्द कालमा और हरदीप बौद्ध आदि वक्ताओं ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
इस वेबिनार का आरम्भ लखनऊ स्थित ऐतिहासिक रिसालदार बुद्ध विहार के मुख्य थेर और प्रबंधक आदरणीय भंते ज्ञानालोक थेरो द्वारा पालि बुद्ध वंदना से हुआ। उन्होंने त्रिशरण और पंचशील की देशना सहित बुद्ध,धम्म और संघ की वंदना की। हिमालयन ट्राइबल बुद्धिस्ट वेल्फेयर सोसायटी के अध्यक्ष लामा शांता नेगी जी द्वारा भोटी (तिब्बति) भाषा में बुद्ध की 12 लीलाओं को ध्यान में रखते हुए वज्रयानी चैंटिंग की। डॉ विकास सिंह ने महायानी प्रज्ञापारमिता मंत्र ‘तद्यथा गते गते पारगते पारसंगते बोधि स्वाहा’ और जापानी निचेरन सम्प्रदाय के मंत्र ‘नम म्यो हो रेंगे क्यो’ की चैंटिंग की।
जोधपुर स्थित जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो प्रवीणचन्द्र त्रिवेदी ने वेबिनार का उद्घाटन करते हुए कोविड महामारी के दौर में बुद्ध की शिक्षाओं की प्रासंगिकता की बात कही। उन्होंने कहा कि आज के दौर में लोक को बुद्ध का तार्किक और वैज्ञानिक मार्ग आवश्यक है। उन्होंने बुद्ध के समतावादी आंदोलन को याद करते हुए कहा कि बुद्ध भारतीय इतिहास के पहले ऐसे व्यक्ति हैं,जिन्होंने मानव-मानव को समान माना और ऊंच-नीच के दर्शन को ध्वस्त किया। कोविड-19 जैसी आपदा में भी जो लोग ब्लैक मार्केटिंग कर रहे हैं, दवाइयों-ऑक्सीजन के तय कीमत से ज्यादा पैसा ले रहे हैं, ऐसे आपदा को अवसर में बदलने वाले भ्रष्ट आचरण वाले लोगों को भगवान बुद्ध से सेवाभाव सीखना चाहिए। तथागत बुद्ध का दर्शन हमें सतत विकास की ओर ले जाता है।
विशिष्टातिथि वक्तव्य
नई दिल्ली स्थित डॉ अम्बेडकर इंटरनेशनल सेन्टर सहाचार्य एवं सामाजिक न्याय संदेश के संपादक डॉ वरुण गुलाटी ने बताया कि भगवान बुद्ध की शिक्षाएँ लोक को प्रकृति के साथ तादात्म्य सिखाती हैं। बुद्ध का धम्म सर्वोच्च प्रज्ञा पर टिका हुआ है जो मनुष्य को न केवल मनुष्य के साथ,अपितु सभी प्राणियों के साथ प्रेम की ओर प्रेरित करता है। बुद्ध उपदेशित पंचशील के सिद्धान्त जहाँ मानवीय आचरण के उत्कृष्ट उदाहरण हैं,वहीं मैत्री उनका प्रतिफलन है।
बीज वक्तव्य
भरतपुर स्थित महाराजा सूरजमल ब्रज विश्वविद्यालय के एम एस जे कॉलेज के सह आचार्य डॉ. राजाराम ने धम्म को मैत्री भावना का प्रसारक बताया। उन्होंने कहा कि धम्म व्यक्ति विशेष को सुधारता है,उसे वैज्ञानिक चेतना से समन्वित करता है। यदि ऐसे कल्याणकारी धम्म को लोक में स्थापित किया जाएगा तो स्वतः ही लोक में शांति और शील की स्थापना होगी।
अध्यक्षीय उद्बोधन
मुम्बई विश्वविद्यालय के जोशी बेडेकर कॉलेज,ठाणे के पूर्व मराठी विभागाध्यक्ष एवं प्रसिद्ध बौद्ध साहित्यकार डॉ दामोदर मोरे ने वक्तव्य देते हुए बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर के विभिन्न सन्दर्भों से बुद्ध और उनके धम्म के प्रति लोक में प्रचलित आस्था और विश्वास की ओर ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने भगवान,बुद्ध, धम्म,संघ,धम्म,अधम्म की विशिष्ट व्याख्या करते हुए सभी के कल्याण की कामना की।
आमंत्रित वक्ताओं उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के पडरौना में स्थित उदित नारायण स्नातकोत्तर कॉलेज के समाजशास्त्र विभाग में सहायक आचार्य डॉ विशम्भर नाथ प्रजापति ने बुद्ध को लोक में एक विकल्प के रूप में देखा। बौद्ध दर्शन के रूप में लोगों को मानवीय,नैतिक और बराबरी का प्रतीक माना जाता है।लोक भाषा पालि को स्थापित करने वाले लोकनायक के रूप में तथागत बुद्ध को समझा जाता है। कुशीनगर में बुद्ध को माथाकुंवर के नाम से भी जाना जाता है। लोक में बुद्ध ऐसे व्यक्तित्व के रूप में उभर कर आते हैं,जिसपर सभी वर्ग अपना सांस्कृतिक हक़ जाहिर कर सकते हैं।
जे एन यू के संस्कृत एवं प्राच्यविद्या संस्थान की डॉ इन्दु डिमोलिया जी ने बौद्ध संस्कृति में ‘थेरीगाथा’ ग्रन्थ के उत्कृष्ट स्थान को रेखांकित करते हुए अर्हत हुई विभिन्न थेरियों के सन्दर्भों से उनके जीवन के सत्य को,उनके जीवनानुभव को बताया। पटाचाराथेरी, भद्राकुण्डलकेशाथेरी, खेमाथेरी, सिसुपचालाथेरी इत्यादि 73 बौद्ध भिक्खुणियों के माध्यम से आधुनिक समय के महिला-विमर्श को करुणा,मैत्री,प्रेम और अहिंसा से समन्वित करते हुए नवायाम देने वाले ग्रन्थ के रूप में थेरीगाथा को देखा।
मदुरै कामराज विश्वविद्यालय, तमिलनाडु के संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ माई राम ने हरियाणा और राजस्थान के विभिन्न सन्दर्भों के माध्यम से लोक आस्थाओं और संस्कृति में समाए तथागत बुद्ध और उनकी शिक्षाओं की व्याख्या की।
लोक में व्याप्त बौद्ध संस्कृति के शाश्वत तत्वों के बारे में बताते हुए डॉ सत्यमुदिता स्नेही, सहायक आचार्य,संस्कृत,राजकीय महाविद्यालय,बावड़ी,जोधपुर ने बताया कि बौद्ध संस्कृति हमें सरलता,समानता,परिवर्तनशीलता,अंतर्राष्ट्रीय सद्भाव,शांति, विश्वबंधुता,मानवता,कर्म और सदाचार पर बल,सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों यथा दया,करुणा, मुदिता,मैत्री आदि के रूप में शाश्वत मूल्य प्रदान करती है जो आज न केवल भारत में,अपितु विदेशों यथा जापान,चीन,तिब्बत, नेपाल,मंगोलिया,श्रीलंका,थाईलैंड, कंबोडिया,मलेशिया,जापान, कोरिया,म्यांमार आदि देशों में भी अपनाए जा रहे हैं। भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अंतरराष्ट्रीय शांति व सद्भाव पर ही बल दिया है।जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राच्यविद्या संस्थान की सोनल बैरवा जी ने बौद्ध दर्शन में प्रतिपादित प्रज्ञा के दैनिक जीवन में महत्त्व की ओर सभी का ध्यान आकृष्ट किया। प्रज्ञा बौद्ध दर्शन के आधारभूत एवं मूल सिद्धान्तों में से एक है जो निर्वाण प्राप्ति के मार्ग शील समाधि एवं प्रज्ञा में से अन्तिम तथा महत्त्वपूर्ण सोपान है। बौद्ध दर्शन के अन्य प्रमुख सिद्धान्त यथा चार आर्य सत्य, प्रतीत्यसमुत्पाद,पञ्चस्कन्ध,मध्यम मार्ग इत्यादि प्रज्ञारूपी वृक्ष के भाग हैं। यह दश पारमिताओं तथा षड् पारमिताओं में अन्यतम है तथा आगे चलकर महायान बौद्ध दर्शन में केन्द्रबिन्दु का स्थान रखती है। प्रज्ञा अर्थात् प्रकृष्ट ज्ञान अथवा शून्यता,जिसका महत्त्व भिक्षु,बोधिसत्त्व के लिए ही नहीं, अपितु सामान्य व्यावहारिक जीवन में भी है। सभी वस्तुएँ परस्पर निर्भर हैं,स्वतंत्र नहीं है, ऐसा अनुभव प्रज्ञा के अभ्यास द्वारा होता है। इसी प्रकार पारिस्थितिकी तंत्र,सामाजिक, आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य, शारीरिक अथवा मानसिक स्वास्थ्य इत्यादि के विषय में प्रज्ञा का विषय प्रासंगिक है।
जेएनयू के संस्कृत एवं प्राच्यविद्या संस्थान की दीपिका नेगी ने महायान लोक परंपरा में निर्दिष्ट सप्तांग पूजा का विशद् विश्लेषण किया। ये सप्तांग हैं – वंदना, पूजा,शरणगमन,पापदेशना, पुण्यानुमोदन,बुद्धाध्येषणा, बोधिपरिणामना। इन सप्तविध अनुत्तरपूजा द्वारा समस्त प्राणियों के दु:खों के प्रशमन का प्रयास किया जाता है जो कि बोधिसत्वों का मूल उद्देश्य होता है।
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, पंजाब के राजनीति विज्ञान विभाग से मुकेश कुमार ने बताया कि कैसे बुद्ध हमें अन्तर्राष्ट्रीय बनाते हैं। बुद्ध को पढ़ने और जानने का आशय है कि आप स्वयं भी प्रज्ञा की ओर उन्मुख होने लगे हो।दिल्ली विश्वविद्यालय के जर्मन भाषा के ‘आर्ट्स एंड कल्चर’ के अध्यक्ष हार्दिक सिंह ने पालि बौद्ध साहित्य के आधारस्तम्भ धम्मपद की मानवीय जीवन में उपादेयता की ओर सबको खींचते हुए कहा कि धम्मपद अपने आप में पर्याप्त है तथागत बुद्ध को समझने के लिए और उनसे जीवन की बारीकियाँ सीखने के लिए।
राजस्थान के उदयपुर विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय के डीन प्रो बी आर बामणिया ने बताया कि संसार में लोगों के बीच परस्पर मैत्री को बढ़ाने में सहायक भगवान बुद्ध का धम्म समाज को सुंदर बनाता है जो प्रज्ञा की भूमि पर टिका हुआ होता है। वैज्ञानिक चिंतन को प्रभावी बनाते हुए प्रकृति की तरफ मनुष्य को लौटने के लिए प्रेरित करता है।राजस्थान के देसूरी विधानसभा के पूर्व विधायक पोकर लाल परिहार ने बाबासाहेब अम्बेडकर के धम्मचक्क अनुप्रवर्तन को याद करते हुए उनके बौद्ध धम्म के क्षेत्र में किए गए योगदान को तथा बहुजन इतिहास को गंभीरता से बताया। उन्होंने सामाजिक स्तर पर विभिन्न दकियानूसी विचारों को त्यागने पर बल देते हुए बताया कि तथागत की शिक्षाओं ने उनके व्यक्तिगत जीवन को कैसे व्यापक स्तर पर लाभान्वित किया है।
साहित्य मित्र डिजिटल समूह, साँचौर के संस्थापक अरविन्द कालमा ने तथागत बुद्ध की करुणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समस्त प्राणियों के प्रति मंगलकामना,सदाशयता,उदारता, सहिष्णुता,समता,मुदिता और मैत्री की भावना के साथ व्यवहार करना ही करूणा है। करुणा अचानक भी आ सकती है,जैसे अंगुलीमाल,अशोक और बन्दा बैरागी में आयी। करुणा जन्म से भी होती है जैसे सिद्धार्थ,नानक, कबीर और अधिकांश औरतों में होती है। करुणा सप्रयास भी आती है,जैसे तिहाड़ में विपस्सना करने से खूंखार कैदियों में प्रकट हुई। जब ईर्ष्या ख़त्म हो जाती है तो करुणा जागती है। ईर्ष्या से भरा मन करुणावान नहीं हो सकता। ये निरन्तर अभ्यास से आती है। ये हम सब के स्वभाव में होती है,किंतु तृष्णा और ईर्ष्या के कारण इसका प्रभाव सूक्ष्म हो जाता है। विपस्सना के निरन्तर प्रयास से इसे विकसित किया जा सकता है।
उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर से स्वतंत्र चिंतक एवं धम्म कार्यकर्त्ता हरदीप बौद्ध ने भगवान बुद्ध के विश्व व्यापक प्रभाव को रेखांकित करते हुए करुणा एवं विज्ञान पर आधारित धम्म की ओर सभी का ध्यान खींचा। उन्होंने बताया कि जब विभिन्न प्रकार के भेद मिटते हैं,तृष्णाएं शांत होती हैं,तब बुध्यांकुर विकसित होते हैं और वे मनुष्य को बुद्धत्व की ओर ले जाते हैं।
इस वेबिनार के आयोजक संगठन राजस्थान के अम्बलिंकिंग फाउण्डेशन,राजस्थान बौद्ध विरासत एवं संस्कृति संवर्धन प्रतिष्ठान,बी ऑन लाइट फाउण्डेशन,जोधपुर स्थित जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के डॉ. बी आर अम्बेडकर अध्ययन केन्द्र और न्यूजक्वेश इंडिया थे। कार्यक्रम के समन्वयक अम्बलिंकिंग फाउण्डेशन एवं राजस्थान बौद्ध विरासत एवं संस्कृति संवर्धन प्रतिष्ठान के ट्रस्टी तथा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के मारवाड़ी कॉलेज के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ विकास सिंह थे। जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के डॉ बी आर अम्बेडकर अध्ययन केन्द्र के निदेशक एवं हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ भरत कुमार संयोजक थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज सांध्य के हिन्दी विभाग की सहायक आचार्या डॉ. राजकुमारी आयोजन सचिव थी। इस वेबिनार में भारत के विभिन्न राज्यों राजस्थान,बिहार, उत्तरप्रदेश,हरियाणा,तमिलनाडु, मध्यप्रदेश,गुजरात,हिमाचल प्रदेश,पंजाब,दिल्ली,उड़ीसा आदि के 100 से अधिक विद्वान शिक्षकों एवं शोधार्थियों, उपासक-अपासिकाओं ने भाग लिया।

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