एम एल एस एम कॉलेज में ‘पुस्तक समीक्षा संवाद’ कार्यक्रम आयोजित

अध्यापन के साथ स्व-अध्ययन और शोधपरक अध्ययन सामग्री का सृजन किसी भी शिक्षक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. यह कृत्य उन्हें भीड़ से अलग खड़ा कर उनकी विशिष्टता की परिचायक होने के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लिए काफी मददगार होती है. यह बात एमएलएसएम कॉलेज की प्रधानाचार्य डॉ मंजू चतुर्वेदी ने बुधवार को महाविद्यालय के मैथिली विभाग द्वारा शांतिनाथ सिंह ठाकुर की लिखी पुस्तक मैथिली के इतिहास की समीक्षा संवाद कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कही. उन्होंने कहा कि शिक्षक यदि अपने अध्यापन कला के साथ सृजनशीलता को जीवित बनाए रखें तो किसी भी विषय का जीवंत बने रहना निश्चित है.
हिंदी विभाग के शिक्षक रामचंद्र सिंह चंद्रेश के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में पुस्तक की समीक्षा करते हुए पीजी मैथिली विभाग के अध्यक्ष प्रो रमेश झा ने कहा कि पुस्तक को मिथिला के आधुनिक इतिहास पर केंद्रित कर लिखा जाना इसकी विशेषता है. वैसे इसमें निहित मिथिला का परिचय, पौराणिक पृष्ठभूमि और प्राचीन इतिहास का संक्षिप्त उल्लेख पुस्तक की संपूर्णता और लेखक के लेखकीय गुण को बखूबी दर्शाता है. डा सतीश कुमार सिंह ने कहा कि मैथिली के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम में इस पुस्तक की उपयोगिता मील का पत्थर साबित होगी. वहीं डा अमरकांत कुमार ने कहा कि वास्तव में साहित्य और इतिहास की धारा दो भिन्न-भिन्न दिशाओं में प्रवाहित होती है, लेकिन इस पुस्तक में दोनों धाराओं के सुंदर समन्वय ने इसे बेहतरीन रूप प्रदान कर इसे काफी उपयोगी बना दिया है.
कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ कृष्ण कुमार ने की. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि इतिहास लेखन एक कठिन और दुष्कर कार्य है. क्योंकि निरपेक्ष रहकर तथ्यपरक विश्लेषण करना किसी लेखक के लिए इतना आसान नहीं होता है. बावजूद इसके डा शांतिनाथ सिंह ठाकुर ने अपनी लेखनी के कौशल से इस कार्य में ईमानदारी बरतते हुए इसे अत्यंत उपयोगी बना दिया है.
मौके पर विभागाध्यक्ष डॉ उषा चौधरी ने मैथिली विभाग के सेवानिवृत्त शिक्षक डा मुरलीधर झा एवं स्नातकोत्तर पीजी अध्यक्ष के रूप में महाविद्यालय से स्थानांतरित हुए प्रो रमेश झा को पाग चादर एवं प्रतीक चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया. धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ शांतिनाथ सिंह ठाकुर ने इस पुस्तक को लिखने के उद्देश्यों को बखूबी रखा. कार्यक्रम में पीजी मैथिली विभाग के शोधार्थी प्रवीण कुमार झा एवं निखिल कुमार की उल्लेखनीय उपस्थिति रही.
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