विकास ऐसा हो जो विनाश से बचायें-डा सुनील

आपदा रोधी एवं पर्यावरण के अनुकूल समाज निर्माण को कृतसंकल्पित तथा विज्ञान एवं तकनीक के विभिन्न पहलुओं को समाज के अन्तिम पंक्ति के लोगों तक पहुंचाने को कटिबद्ध पथ निर्माण विभाग , बिहार के अधीक्षण अभियंता ,बिहार अभियन्त्रण सेवा संघ के पूर्व महासचिव एवं इण्डियन इन्जीनियर्स फेडरेशन (पूर्व) के पूर्व उपाध्यक्ष डा सुनील कुमार चौधरी तारामंडल आडिटोरियम, इन्दिरा गांधी साइन्स परिसर, पटना में आयोजित प्रथम सस्टेनेबिलिटी कन्भेन्शन में शोध पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि विकास ऐसा हो जो विनाश से बचायें, विकास ऐसा हो जो पर्यावरण को बचायें।उनके शोध पत्र का विषय था- -सस्टनेबल बिल्ट इन्वायरनमेंट -पर्सपेक्टिव औन ह्यूमन सेंट्रिक एप्रोच।डा चौधरी ने मानव केंद्रित दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में सस्टेनेबल बिल्ट इन्वायरनमेंट की व्याख्या, एवं इसके विभिन्न पहलुओं पर बड़े ही रोचक ढंग से प्रकाश डाला। प्रस्तुतीकरण की शुरुआत करते हुए उन्होने बिल्ट इन्वायरनमेंट एवं सस्टनेबल डेवलपमेंट के बारे में विस्तार से चर्चा की ।उन्होने प्रूफ, रेसिस्टेन्ट एवं रेजिलिएन्ट स्ट्रक्चर के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि सस्टनेबल एवं रेजिलिएन्ट निर्माण एवं प्रबंधन न केवल सस्ता है बल्कि ड्यूरेबल एवं पर्यावरण के अनुकूल भी है ।उन्होने बिल्ट इन्वायरनमेंट के निर्माण में स्मार्ट मैटिरियल ,इनोवेटिव,कौस्ट इफेक्टिव, इन्वायरनमेंट फ्रेंडली, क्लाइमेट रिजीलिएन्ट एवं डिजास्टर रिजीलिएन्ट टेक्नोलॉजी/मैटिरियल के प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया ।उन्होने क्षतिग्रस्त संरचनाओं के एडवान्स कम्पोजिट मैटिरियल से रेट्रो फिटिन्ग तकनीक पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने सस्ता एवं पर्यावरण के अनुकूल तकनीक के विभिन्न पहलुओं पर बड़े ही सहज-सरल एवं रोचक ढंग से प्रकाश डाला । साथ ही कौस्ट इफेक्टिव, इको फ्रेंडली, क्लाइमेट रिजीलिएन्ट एवं डिजास्टर रिजीलिएन्ट रूरल हाउस निर्माण के तकनीक की व्याख्या केस स्टडी के द्वारा बड़े ही रोचक से की।डा चौधरी ने बताया कि सस्टनेबल मैटेरियल का प्रयोग कर न केवल सड़क के भार वहन छमता को बढाया जा सकता है बल्कि सड़क के क्रस्ट की मुटाई को भी कम किया जा सकता है ।डा चौधरी ने बताया कि सडक निर्माण मे प्लास्टिक का उपयोग कर न केवल अर्थक्वेक रेजिलिएन्ट एवं सस्ता सड़क निर्माण किया जा सकता है बल्कि पर्यावरण के हो रहे नुकसान को भी कम किया जा सकता है ।उन्होने बताया कि अगर डिजास्टर रेजिलिएन्ट निर्माण एवं प्रबंधन करना है तो बैम्बु,जुट एवं प्लास्टिक के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा । डा चौधरी ने बताया कि जूट एवं प्लास्टिक के प्रयोग से न केवल डिजास्टर रेजिलिएन्ट सड़क का निर्माण होगा बल्कि संरचना की लाइफ भी दुगुनी हो जाएगी ।डॉ चौधरी ने बताया कि भारत एक बहुआपदा पर्वत देश है जहां सस्टनेबल बिल्ट इन्वायरनमेंट की परिकल्पना को साकार करने के लिए इन्टिग्रेटेड एप्रोच अपनाने की जरूरत है।इसके लिए समाज में लोगो को जागरूक करना होगा। डा चौधरी ने निर्माण कार्य में अभिकल्प एवं मटेरियल के विशिष्टयो एवं प्रबंधन नीतियों में बदलाव की जरूरत की जोरदार वकालत की एवं इस दिशा में शोध को बढ़ावा देने की जरूरत बताई ।उन्होने सस्टनेबल बिल्ट इन्वायरनमेंट के लिए डिजास्टर रेजिलिएन्ट निर्माण एवं प्रबंधन में नैनोटेक्नोलॉजी, बायो कंक्रीट, ग्रीन कंक्रीट एवं बायो इन्जिनियरिन्ग की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला।उन्होने बताया कि ऐसे पौधों को लगाने की जरूरत है जो कार्बन डाई ऑक्साइड का शोषण कर सके। उन्होने बताया कि क्लाइमेट रिजीलिएन्ट एण्ड डिजास्टर रिजीलिएन्ट निर्माण एवं प्रबंधन पर समाज के हर तबके को जागरूक करने के अभियान को एक आन्दोलन का रूप देकर पूरा देश में फैलाने की जरूरत है ।डा चौधरी ने बताया कि उनके द्वारा समाज के विभिन्न स्टेकहोल्डर को बड़े पैमाने पर आपदा प्रबंधन एवं आपदा रोधी भवन निर्माण पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है एवं आपदा रोधी भवनों का निर्माण भी करवाया जा रहा है। उन्होने बताया कि बिहार के माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के सपना सुरछित बिहार विकसित बिहार को साकार करने के लिए चलाया जा रहा यह समाज को सुरछित करने का अभियान एक आन्दोलन है जिसे कालखंड हमेशा याद रखेगा । उन्होंने बताया कि डा चौधरी अन्तरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर के तकनीकी एवं सामाजिक संगठनों से जुड़कर विभिन्न प्रकार की आपदाओं से निपटने के लिए इनोवेटिव,डिजास्टर रेजिलिएन्ट एवं कौस्ट इफेक्टिव टेक्नोलॉजी को समाज के अन्तिम पंक्ति के लोगों तक पहुंचाने का काम करते रहे है ।डा चौधरी ने अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय जर्नल एवं कान्फ्रेस में 235 से ज्यादा शोध पत्र प्रस्तुत कर चुके हैं एवं उन्हें 28 अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा जा चुका है । उन्होंने अपनी बात इन पंक्तियों के साथ समाप्त की-
“हम लोग हैं ऐसे दीवाने, तकनीक बदलकर मानेंगे।
मंजिल को पाने निकले हैं, मंजिल को पाकर मानेंगे।।
अन्त में उन्हें प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
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