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विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुरेंद्र प्रताप सिंह ने द्विदिवसीय संगोष्ठी का किया ऑनलाइन उद्घाटन दरभंगा news 24 live (ajit kumar singh)

 

विश्विद्यालय संस्कृत विभाग द्वारा “संवेदनशील समाज के निर्माण में संस्कृत की भूमिका” विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी प्रारंभ*

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुरेंद्र प्रताप सिंह ने द्विदिवसीय संगोष्ठी का किया ऑनलाइन उद्घाटन

संगोष्ठी में देश-विदेश के अनेकानेक विद्वानों ऑनलाइन व ऑफलाइन जुड़कर रखे अपने विचार

संस्कृत सभी क्लासिकल भाषाओं में अग्रणी,सेमिनार का विषय अति विस्तृत- प्रो डाली सिन्हा

विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग से गत 31 मार्च को अवकाश प्राप्त डा जयशंकर झा का संगोष्ठी में किया गया सम्मान

साहित्य संवेदनशीलता एवं संस्कार के लिए जाना जाता है। वह मानवीय मूल्य विहीन नहीं हो सकता। संस्कृत साहित्य अति संवेदनशील तथा मानवीय मूल्यों से जुड़ा हुआ है।यह देववाणी एवं आदि भाषा की संज्ञा से विभूषित है जो पूरे भारतवर्ष में मान्य है।संस्कृत सृजनशील एवं लोक कल्याणकारी भाषा है,जिसमें आदि ग्रंथ रचित हैं। संस्कृत साहित्य के कल्याणकारी मार्ग हमेशा अनुकरणीय हैं,जिसे विशिष्ट जनों के साथ ही सामान्य जन भी पढ़ कर लाभान्वित हो सकता है। उक्त बातें मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सुरेंद्र प्रताप सिंह ने विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के तत्वावधान में जुबली हॉल में आयोजित “संवेदनशील समाज के निर्माण में संस्कृत की भूमिका” विषयक दो दिवसीय संगोष्ठी का ऑनलाइन उद्घाटन करते हुए कहा। कुलपति ने संगोष्ठी में आए देश-विदेश के अतिथियों एवं प्रतिभागियों का विश्वविद्यालय की ओर से स्वागत किया। उन्होंने संगोष्ठी की सफलता की कामना करते हुए कहा कि संगोष्ठी से न केवल प्रतिभागियों को,बल्कि पूरे समाज को लाभ होगा।
मुख्य अतिथि के रूप में संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो शशिनाथ झा ने कहा कि संस्कृत विद्या के अभाव में भारतीय मनीषा का कोई भी क्षेत्र पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता है। संस्कृत के अथाह ज्ञान-सागर से मूल्यवान मोतियों को चुनकर यथासमय उपयोग में लाने की महती आवश्यकता है,तभी हमारा समाज संवेदनशील बन सकता है।
विशिष्ट अतिथि के रूप में मिथिला विश्वविद्यालय की प्रति कुलपति प्रो डोली सिन्हा ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है।संस्कृत साहित्य हमेशा से ही संवेदनशील रहा है।संस्कृत सभी क्लासिकल भाषाओं में अग्रणी है। सेमिनार का विषय अति विस्तृत एवं उपयोगी है। कोरोना काल में हमारे वैज्ञानिकों एवं डॉक्टरों ने भी ऋषि-मुनियों की तरह काम किया है,जिनके बताएं मार्ग पर चलकर ही हम कोरोना महामारी काल में अपने जीवन की और समाज की रक्षा कर सकते हैं।
बौद्ध-पाली विश्वविद्यालय होमागामा,कोलंबो के लैंग्वेज फैकल्टी एवं संस्कृत विभाग के डीन भंते प्रो लेनेगल सिरिनिवास महाथेरो ने कहा कि विश्व साहित्य का नैतिक,आध्यात्मिक व सांस्कृतिक देन जितना संस्कृत का है,उतना अन्य किसी साहित्य का नहीं। हमारा देश भी संस्कृत साहित्य का ऋणी है।
मुख्य वक्ता के रूप में नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय,काठमांडू के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक प्रो गोविंद चौधरी ने कहा कि संस्कृत साहित्य में विश्व को परिवार मानकर- *सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयाः* जैसे महत्वपूर्ण सूत्र वाक्यों में जो संवेदनशीलता मिलती है,वह अन्यत्र दुर्लभ है।इस साहित्य ने न केवल भारत के लिए,अपितु संपूर्ण विश्व को संरक्षित तथा स्वस्थ रखने में काफी योगदान किया है।हमें विश्व कल्याण की भावना संस्कृत साहित्य में सर्वत्र परिलक्षित होती है।बीपीएस कॉलेज,गोपालगंज से प्रधानाचार्य प्रो सिद्धार्थ शंकर सिंह ने कहा कि हमारी संस्कृति एवं संस्कृत साहित्य दोनों संवेदनशील है। संस्कृत साहित्य की संवेदनशीलता को अपनाकर ही समाज का कल्याण किया जा सकता है ।
जेएनयू ,नई दिल्ली के संस्कृत प्राध्यापक प्रो रामनाथ झा ने कहा कि संस्कृत साहित्य ज्ञान-विज्ञान का भंडार है। यह हमेशा से ही अध्ययन-अध्यापन एवं शोध का विषय रहा है,जिसमें संस्कृति संरक्षित है।हमारी विदेश नीतियां भी संस्कृत साहित्य के प्रभाव से कल्याणकारी एवं संवेदनात्मक तत्वों से युक्त होती है।संस्कृत में पर्यावरण तथा महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता का भाव सर्वत्र परिलक्षित होता है।
संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो श्रीपति त्रिपाठी ने कहा कि सेमिनार का विषय महत्वपूर्ण है। आज के समय में इस विषय पर गंभीर चिंतन-मनन की आवश्यकता है।यह संगोष्ठी समाज में व्याप्त अनेक भ्रांतियों को दूर करेगा।संस्कृत साहित्य पूरी तरह संवेदनशीलता से जुड़ी हुई है,जहाँ नारियों का काफी सम्मान किया गया है।
विषय प्रवेश कराते हुए डा जयशंकर झा ने कहा कि आज समाज में संवेदनशून्यता आ रहा है। हमारा कर्तव्य है कि हम समाज का मार्गदर्शन करें। शिक्षक समाज के प्रकाश पुंज होते हैं, जिनके दायित्वबोध से ही समाज को सही मार्ग मिल पाएगा।संस्कृत साहित्य में समूह के कल्याण की कामना की गई है।दूसरों की पीड़ा को महसूस करना ही संवेदनशीलता है,जिसके लिए हमें हमेशा क्रियाशील होना पड़ेगा। आज संस्कृत सिर्फ पढ़ने की जरूरत नहीं,बल्कि करने की भी जरूरत है।
सेमिनार में प्रो रेणुका सिन्हा, प्रो रामनाथ सिंह,डा के सी सिंह,डा नीरजा मिश्र,प्रो प्रीति झा,प्रो चंद्र भानु प्रसाद सिंह,प्रो अरुणिमा सिन्हा,प्रो ए के बच्चन,प्रो रमेश झा,डा आर एन चौरसिया,डा विनय कुमार झा,डा संजीत कुमार झा,डा विकास कुमार,डा ममता स्नेही,प्रो संजीव कुमार,डा नंद किशोर शास्त्री,डा योगेंद्र महतो,डा रामप्रीत सिंह,डा विनोद बैठा, उज्जवल कुमार,डा मुकेश निराला,प्रो विनोद कुमार चौधरी, डा अयोध्यानाथ झा,डा मंजू कुमारी,डा जयानंद मिश्र व प्रो रमेश झा सहित अनेक विद्वान्, शोधार्थी एवं विद्यार्थी ऑनलाइन एवं ऑफलाइन उपस्थित हुए।
अध्यक्षीय संबोधन में संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो विद्याधर मिश्र ने कहा कि समाज निर्माण में तथा समाज कल्याण में संस्कृत साहित्य की अतुलनीय योगदान रहा है।संवेदनशील समाज का मूल आधार संस्कृत साहित्य ही है जो आज के संदर्भ में अत्यधिक प्रासंगिक है। संस्कृत साहित्य पंचतत्वों के प्रति भी संवेदनशील रहा है।
विषय प्रवेश कराते हुए डा जयशंकर झा ने कहा कि आज समाज में संवेदनशून्यता आ रहा है।हमारा कर्तव्य है कि हम बुद्धिजीवी समाज का मार्गदर्शन करें।शिक्षक समाज के प्रकाशपुंज होते हैं,जिनके दायित्व बोध से समाज को सही मार्ग मिल पाएगा। संस्कृत साहित्य में समूह के कल्याण की कामना की गई है। दूसरों की पीड़ा को महसूस करना ही संवेदनशीलता है,जिसके लिए हमें हमेशा क्रियाशील होना पड़ेगा। आज संस्कृत सिर्फ पढ़ने की जरूरत नहीं,बल्कि करने की भी जरूरत है।
अतिथियों का स्वागत पाग,चादर माला तथा स्मृतिचिह्न से किया गया। सरस्वती वंदना तथा कुलगीत विश्वविद्यालय संगीत विभाग की रानी,ऋतु,शारदा, शिवानी व श्वेता आदि ने प्रस्तुत किया,जबकि स्वागत गान पारस पंकज झा तथा मयंक ने प्रस्तुत किया।
डा मित्रनाथ झा के संचालन में आयोजित उद्घाटन सत्र में स्वागत संबोधन विभागाध्यक्ष प्रो जीवानंद ने किया,जबकि धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव डा आर एन चौरसिया ने किया।
संगोष्ठी में विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग से 31 मार्च, 2021 को अवकाश प्राप्त डा जयशंकर झा को विभाग की ओर से फूल-माला,पाग-चादर व उपहार आदि प्रदान कर सम्मानित किया गया।वहीं जम्मू से आयी वैदेही, विश्वविद्यालय भूगोल विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा जयानंद मिश्र तथा दरभंगा सेंट्रल स्कूल के प्राचार्य डा ए के कश्यप आदि ने पाग-चादर तथा उपहार आदि से डा जयशंकर झा का मंच पर सम्मान किया।वहीं संस्कृत विभाग द्वारा संस्कृत के प्राध्यापक डा ममता स्नेही,डा आर एन चौरसिया,डा संजीत कुमार झा,डा विनय कुमार झा तथा डा कृष्णकांत झा आदि का भी फूल-माला,पाग-चादर एवं स्मृतिचिह्न आदि से विभागाध्यक्ष डा जीवानंद झा ने सम्मानित किया। तदनंतर विभागाध्यक्ष डा जीवानंद झा की अध्यक्षता मेंं तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया, इसमें अनेक शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने अपने पत्र वाचन किए।

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