विद्यापति सेवा संस्थान ने हिंदू नव वर्ष व जुड़ शीतल पर्व की शुभकामनाएं दी
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वर्चुअल मोड में 15 को मनाया जाएगा यानी आज जुड़ शीतल महोत्सव
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विद्यापति सेवा संस्थान की ओर से महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने बुधवार को समस्त मिथिला वासी एवं प्रवासी मैथिलों को हिंदू नव वर्षारंभ एवं पारंपरिक पर्व जुड़ शीतल की शुभकामना दी। बुधवार को विज्ञप्ति जारी कर उन्होंने कहा कि मिथिला में मेष संक्रांति को नव वर्ष के रूप में मनाए जाने की परंपरा रही है और इस दिन प्रकृति से जुड़ी संस्कृति के प्रतीक के रूप में जुड़ शीतल पर्व मनाया जाता है। जिसका मूलभूत उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण एवं स्वच्छता के संदेश को बढ़ावा देना है। मैथिली अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पं कमलाकांत झा ने कहा कि प्रकृति से गहरे रूप में जुड़े इस पर्व की मिथिला के सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरोकार में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
वरिष्ठ साहित्यकार मणिकांत झा ने कहा कि दो मौसमों के संक्रमण काल में मिथिला में मनाया जाने वाला यह सांस्कृतिक पर्व मानव और प्रकृति से सीधे रूप में जुड़ा है। गर्मी में जल का सेवन अधिकाधिक करने का संदेश देता यह पर्व अनेक वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुकूल भी है। उन्होंने बताया कि कई वर्षों से मनाया जाने वाला जुड़ शीतल महोत्सव कोरोना महामारी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए पिछले वर्ष की तरह इस बार भी 15 अप्रैल को वर्चुअल मोड में मनाया जाएगा।
प्रो जीवकांत मिश्र ने कहा कि मिथिला में नववर्ष की सौगात लेकर आने वाला यह सामाजिक त्योहार पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। क्योंकि इस दिन पुराने वृक्षों की जड़ों में पानी देने के साथ ही नए पौधों को लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने की परंपरा रही है।
मीडिया संयोजक प्रवीण कुमार झा ने कहा कि फसली नूतन वर्ष के शुभारंभ की सौगात लेकर आने वाला यह पर्व मिथिला में सामाजिक, आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक सामंजस्य कायम रखने में अपना खास स्थान रखता है। इस मौके पर कादो-माटी खेलने से जहां अनेक तरह के चर्म रोगों से निजात मिलता है वहीं साफ-सफाई एवं पेड़ों में जल देने और पौधारोपण की परंपरा जीवंत होती है। प्रो चंद्रशेखर झा बूढ़ा भाई ने कहा कि इस पर्व की महत्ता ग्रीष्म ऋतु की तपिश व पानी की महत्ता से जुड़ी है।
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