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पर्यावरण के बचाव के लिए नीतिगत बदलाव की जरूरत

पर्यावरण के बचाव के लिए नीतिगत बदलाव की जरूरत

बिहार अभियन्त्रण सेवा संघ द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर एक बेबिनार का भी आयोजन किया गया जिसका विषय था-“कोरोना का पर्यावरण पर प्रभाव एवं आगे की रणनीति “।स्वागत भाषण देते हुए ई जे पी सिंह कश्यप अध्यक्ष,बेसा द्वारा कोरोना काल का पर्यावरण पर प्रभाव पर प्रकाश डाला गया। विषय परिचय कराते हुए ई अविनाश कुमार,संगठन सचिव द्वारा कोरोना का पर्यावरण पर पोजिटिव एवं निगेटिव प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की गई। इस अवसर पर बेसा के महासचिव डा सुनील कुमार चौधरी ने बताया कि वर्तमान वैश्विक महामारी के परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण संरक्षण हेतु नीतिगत बदलाव की जरूरत है। उन्होने पर्यावरण बचाव के लिए वृक्षारोपण ,जल जीवन हरियाली कार्यक्रम को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया Iसाथ ही निर्माण कार्यों में पर्यावरण के अनुकूल टेक्नोलॉजी को बढ़ावा दिये जाने की जोरदार वकालत की Iउन्होने अभियंताओ से तटबंधो पर भेटिभर घास जियोटेक्सटाइल के साथ लगाने हेतु आह्वान कियाI

डा चौधरी ने आगे बताया कि वर्तमान में देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया कोरोना वायरस नामक एक ऐसे दुष्चक्र में फंसी है जिससे निकलने के लिए असाधारण कदमों और उपायों की जरूरत है. जहाँ एक ओर कोरोना वायरस (कोविड-19) की वजह से मानव जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त एवं प्रभावित हुआ है, वही दूसरी तरफ यह प्रकृति के लिए किसी वरदान से कम नही हैI हम सिर्फ सिक्के के एक पहलू के आधार पर कोरोना वायरस को महामारी मान रहे हैं, परंतु अगर दूसरे पहलू को देखा जाए तो यह पारिस्थितिकी तंत्र, प्रकृति एवं पर्यावरण के लिए तो वरदान सिद्ध हो रहा है.कोरोना काल में लौक डाउन के कारण वायु,जल एवं ध्वनि प्रदूषण में अप्रत्याशित कमी आयी है। जिस तरह मौजूदा समय में जान बचाना लोगों की प्राथमिकता बना हुआ है वैसे ही लोगों को पर्यावरण के प्रति चिंतित कराया जाना ज़रुरी है. पर्यावरण को बचाने के लिए लोगों को अपनी आदतें बदलनी होंगी. जैसे खुद अपने को हफ्ते का कोई एक दिन अपने को लॉकडाउन में रखना या फिर सप्ताह में एक दिन गाड़ी का इस्तेमाल के बजाय साइकिल या पैदल चलना या फिर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना. सरकार गाड़ियों से निकलने वाले धुएँ में कमी लाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को मज़बूत बना सकती है. एक और उपाय किया जा सकता है कि हफ़्ते में दो दिन वर्क फ्रॉम होम कर दिया जाए. अगर सरकार चाहे तो महीने में दो दिन लॉकडाउन रख सकती है जिसमे गाड़ियां और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित करने वाली फैक्ट्रियां बंद रहे एवं ग्रीन टैक्स को बढ़ावा दे सकती है। समय आ गया है कि केन्द्र और राज्य की सरकार इस बात पर गंभीरता से मंथन करें कि ऐसे कौन-कौन से उपाय किए जाएं जिससे अपनी दिनचर्या या रोजी-रोटी चलाने के लिए लोगों को कम से कम सड़क पर आना पड़े. एक अनुमान के अनुसार देश की करीब 25 से 30 प्रतिशत आबादी को अपना कामकाज निपटाने के लिए सिर्फ इसलिए सड़क पर इधर से उधर दौड़ाना पड़ता हैं क्योंकि उसके पास तकनीकी ज्ञान काफी कम है या नहीं है. यही वजह है जहां कई विकसित और विकाशसील देशों में जो काम लोग घरों में बैठे-बैठे ऑनलाइन निपटा देते हैं, उसी काम को करने के लिए आम भारतीय को सरकारी आफिसों, बैंकों, मेडिकल स्टोरों, फल-सब्जी और राशन की दुकानों आदि के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इसके चलते आम भारतीय को समय, श्रम और पैसा तीनों बर्बाद करना पड़ता है.इस महामारी ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि संकट की घड़ी में सारी दुनिया एक साथ खड़ी होकर एक-दूसरे का साथ देने के लिए तैयार है. तो फिर क्या यही जज़्बा, जोश और इच्छा शक्ति हम पर्यावरण बचाने के लिए ज़ाहिर नहीं कर सकते?इस अवसर पर परिचर्चा मे ई अमरेन्द्र कुमार सिंह,पूर्व महासचिव, बेसा,द्वारा पर्यावरण प्रदूषण मे मानव के मानसिक प्रदूषण की भूमिका एवं उसके उपायों पर चर्चा की गई। वही बेसा के पूर्व अध्यक्ष ई मदन मोहन कुमार द्वारा परिचर्चा में भाग लेते हुए वृक्षारोपन को बढ़ावा देने की बात कही गई। भारी संख्या मे अभियंताओ ने भाग लेकर अपने विचार व्यक्त किये। ई भगवान राय,प्रचार सचिव,बेसा द्वारा बिषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए धन्यवाद ग्यापन किया गया। तत्पश्चात आयोजन समापन की घोषणा की गई।

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