‘विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस” के अवसर पर ऑनलाइन विचारगोष्ठी एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित

सी एम कॉलेज,दरभंगा के स्थापना दिवस के तहत डा प्रभात दास फाउंडेशन व संस्कृत विभाग द्वारा कार्यक्रम आयोजित

‘विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस” के अवसर पर ऑनलाइन विचारगोष्ठी एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित

कार्यक्रम को प्रो विश्वनाथ झा, प्रो विद्यानाथ झा, डा विकास सिंह तथा डा आर एन चौरसिया आदि ने किया संबोधित

अतिथियों द्वारा महाविद्यालय परिसर में आम, लीची, कटहल व आमला आदि के लगाए गए 1 दर्जन से अधिक पेड़-पौधे

भारतीय धर्म-संस्कृति तथा हमारी प्राचीन जीवन- पद्धति प्रकृति के सर्वाधिक अनुकूल- प्रो विद्यानाथ

मानव-जीवन रक्षक प्रकृति पूर्णत: समावेशी,सामाजिक व धर्मनिरपेक्ष- प्रो विश्वनाथ

पूंजीवादी-व्यवस्था एवं आरामतलबी जीवन-शैली प्रकृति के प्रतिकूल व आत्मघाती- डा विकास
हमारी प्रकृति हर जायज मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में पूर्णतः सक्षम है। बाढ़, भूकंप,अतिवृष्टि, अनावृष्टि महामारी तथा अगल्लगी आदि प्रकृति का रौद्र रूप है,जिसके द्वारा प्रकृति अपने-आप को संतुलित करती है। उक्त बातें स्थानीय एमएलएसएम कॉलेज, दरभंगा के पूर्व प्रधानाचार्य एवं पर्यावरणविद् प्रो विद्यानाथ झा ने सी एम कॉलेज, दरभंगा के स्थापना दिवस समारोह- 2021 के सुअवसर पर डा प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा तथा संस्कृत विभाग, सी एम कॉलेज, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में “विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस” के अवसर पर आयोजित ‘विचारगोष्ठी एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम’ को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा। उन्होंने कहा कि भारतीय धर्म-संस्कृति तथा हमारी प्राचीन जीवन-पद्धति प्रकृति के सर्वाधिक अनुकूल है। जहाँ हर शुभ कार्यों एवं पर्व-त्योहारों अवसर पर वृक्षों के पूजन की पद्धति है।
मुख्य वक्ता के रूप में मारवाड़ी महाविद्यालय, दरभंगा के संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं पर्यावरण विशेषज्ञ डा विकास सिंह ने कहा कि पूंजीवादी व्यवस्था एवं आरामतलबी जीवनशैली प्रकृति के प्रतिकूल तथा हमारे लिए आत्मघाती है। प्रकृति के अभिन्न अंग होने के कारण हमारा कर्तव्य है कि हम इसका निरंतर संरक्षण एवं संवर्धन करें। प्राचीन कालीन संस्कृत साहित्य एवं बौद्ध ग्रंथों में प्रकृति की रक्षा तथा उसके प्रति चेतना का भाव वर्णित है, जिसका हमें अपने मन, वचन और कर्म से पालन करना चाहिए,अन्यथा संपूर्ण जीवजगत नष्ट हो जाएगा।
अध्यक्षीय संबोधन में प्रधानाचार्य एवं प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो विश्वनाथ झा ने कार्यक्रम के आयोजकों को धन्यवाद देते हुए कहा कि मानवीय शरीर प्रकृति से निर्मित है, जिसकी रक्षा हर स्तर पर हमें करनी चाहिए। उन्होंने मानव जीवन की रक्षक प्रकृति को समावेशी, सामाजिक तथा धर्मनिरपेक्ष स्वभाव वाला बताते हुए कहा कि पेड़-पौधे हमेशा ऋषि-मुनियों की तरह हमें लाभ ही लाभ प्रदान करते हैं। आज हमें अधिकार के साथ-साथ कर्तव्यों का भी पालन आगे बढ़कर करना चाहिए, तभी हम इन वृक्षों से आर्थिक मानसिक सहित हर तरह के लाभ उठा सकते हैं।
आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्कृत विभागाध्यक्ष डा आर एन चौरसिया ने कहा कि बढ़ती जनसंख्या तथा हमारी विलासिता पूर्ण जीवनशैली के कारण प्रकृति को अत्यधिक नुकसान हो रहा है। भौतिकतावाद ने प्रकृति को कई तरह के खतरे उत्पन्न हो गए हैं। हम अपनी सोच तथा जीवनशैली बदल कर ही प्रकृति की रक्षा कर सकते हैं।
कार्यक्रम को दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली से संस्कृत प्राध्यापक, डा राजेश कुमार, आशीष रंजन तथा पप्पू सिंह आदि ने भी संबोधित किया, जबकि प्रो इंदिरा झा, प्रो मंजू राय, राजकुमार गणेशन,अनिल कुमार सिंह, अमरजीत कुमार, भूषण कुमार, प्रियंका कुमारी, प्रह्लाद कुमार, लव कुमार, गिरधारी कु झा, अंजनी कु झा, विजय कु पंडित, रंजू भारती, अनीता यादव, गुंज बिहारी, खुशबू कुमारी, रणधीर कुमार, सुभाष कुमार, श्वेता कुमारी, निशांत अंजुम, कुमार सौरभ, राम प्रकाश मंडल तथा प्रधान सहायक विपिन कुमार सिंह आदि सहित 50 से अधिक व्यक्तियों ने भाग लिया।
इस अवसर पर अतिथियों द्वारा महाविद्यालय परिसर में आम, कटहल, लीची, आंमला आदि के एक दर्जन से अधिक पेड़ लगाए गए। फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन एनसीसी पदाधिकारी डा शैलेंद्र श्रीवास्तव ने किया।

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