कादम्बरी की मैथिली मे अनूदित पुस्तक का कुलपति ने किया विमोचन

संस्कृत समस्त भारतीय आर्यभाषा की जननी है। इसे देवभाषा भी कहा जाता है। वाणभट्ट की ‘कादम्बरी’ मैनें भी पढ़ा है। इसमे महाश्वेता की अत्यंत रोचक तथा अविस्मरणीय कथा वर्णित है। उक्त बातें वाणभट्ट कृत कादम्बरी(संस्कृत) के मैथिली में अनूदित प्रो रमण झा की कृति का विमोचन करते हुए ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कही। उन्होंने कहा कि संस्कृत एक समृद्ध भाषा है और वाणभट्ट उस भाषा के सर्वश्रेष्ठ गद्यकार हैं और भारत की सर्वश्रेष्ठ साहित्यक संस्था- साहित्य अकादेमी ने इसका अनुवाद करबा कर प्रकाशित कर नेक कार्य किया है । इस तरह के अनुवाद कार्य से मैथिली अवश्य ही समृद्ध स्वरूप को प्राप्त करेगी।
कुलपति कार्यालय में आहूत विमोचन कार्यक्रम में कुलसचिव प्रो. मुश्ताक अहमद ने भी कादम्बरी को पढ़ने की बात कही। साहित्य से विशेष रुचि रखने के कारण उन्होंने बड़े गौर से उस पुस्तक को देखा और उन्होंने कहा कि यह वाणभट्ट की कालजयी रचना है। मैथिली के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डा. बैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’ ने इस अनुवाद कर्य की सराहना करते हुए अनुवादकर्त्ता को धन्यवाद दिया। इस अवसर पर अनुवादक प्रो.रमण झा ने कहा कि लोग उपन्यास साहित्य को पाश्चात्य साहित्य की देन मानते हैं किन्तु सातवीं शताब्दी में जो वाणभट्ट ने साहित्य को दिया वह आज भी अतुलनीय है। इस अवसर पर मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश झा, प्रो.अशोक कुमार मेहता आदि उपस्थित थे।
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