बिहार के दुबे टोल गांव के महादलित बस्ती में पहली बार एक बेटी होगी मैट्रिक पास, दुबे टोला में मिटा अशिक्षा का अंधियारा

200 परिवार और 1000 से अधिक आबादी वाले दुबे टोला गांव में लगभग 90% संख्या में महादलित हैं.
बचपन बचाओ आंदोलन’ की बाल समिति की सदस्य इंद्रा कुमारी इस बार मैट्रिक का परीक्षा देगी
सीतामढ़ी: भारत -नेपाल सीमा के नजदीक सीतामढ़ी जिला के परिहार प्रखंड में दुबे टोल गांव के महादलित बस्ती के लिए 9 जुलाई 2020 ऐतिहासिक दिन था, जब नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी (Kailash Satyarthi) के संगठन ने बचपन बचाओ आंदोलन के तहत प्रशासन के साथ मिलकर रघुवरपुरा दिल्ली से गांव के 5 बच्चों को बाल बधुआ मजदूर से मुक्त कराया था, जिसके बाद उन्होंने गांव के बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा के लिए ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ शुरू किया था.
*अब तक कोई बेटी मैट्रिक पास नहीं*
200 परिवार और 1000 से अधिक आबादी वाले दुबे टोला गांव में 90% संख्या में महादलित हैं, लेकिन अब तक गांव के महादलित बस्ती में एक भी मैट्रिक पास बेटी नहीं है. लेकिन कहते है कि अगर मौका मिलें तो युवा नया इतिहास लिखने को तैयार हैं. बचपन बचाओ आंदोलन की अनूठी पहल से यहां पर एक और इतिहास लिखा रहा है. इस बस्ती की बेटियां में से एक इंदिरा कुमारी गांव की महादलित समुदाय की पहली बेटी हैं, जो मैट्रिक का परीक्षा देगी. यहां की 15 बेटियां कस्तूरबा विद्यालय में आठवीं कक्षा में अध्ययनरत है. गांव के महादलित बस्ती में अब तक कोई मैट्रिक पास बेटी नहीं है.
ऐसे मिली इंदिरा को राह
‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की ओर से गठित बाल समिति की सदस्य इंद्रा कुमारी इस बार मैट्रिक का परीक्षा देगी. ग्रामीण बताते हैं कि गांव में महादलित समुदाय से पहली बेटी इस बार मैट्रिक का परीक्षा दे रही है,यह गर्व की बात है. इस उपलब्धि से गांव से अशिक्षा का अंधकार मिट रहा है. इतना ही नहीं अभिभावकों में बेटियों के शिक्षा के प्रति जागरूकता आने लगी है. इससे गांव में खुशी की लहर है . इंदिरा का विभिन्न कार्यक्रमों में बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता ने मनोबल बढ़ाया और इंदिरा के सपनों को जब सम्मान मिला तो इंदिरा का शिक्षा के प्रति लगाव और भी बढ़ने लगा. अब इंदिरा खुद गांव में बच्चों कि शिक्षा और सुरक्षा के लिए लोगों को जागरूक करती है.
गांवों में नहीं होने देंगे शोषण
गौरतलब है कि सुरक्षित बचपन दिवस के अवसर पर स्वयं नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने दुबे टोला के बच्चों से बात कि थी, जिससे इस अनूठी पहल को और भी बल मिला. जिसके बाद यहां की बस्ती में लोगों ने शिक्षा के महत्त्व को समझा और अब वो अपने बच्चों को शिक्षा की ओर बढ़ा रहे हैं. इसके बाद यहां के लोगों ने संकल्प लिया है कि अब अपने गांव में किसी भी बच्चे के साथ किसी प्रकार का शोषण नहीं होने देंगे और बच्चों को शिक्षा ग्रहण करवा कर उन्हें उनका अधिकार देंगे.
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