सी एम कॉलेज के इग्नू अध्ययन केन्द्र तथा डा प्रभात दास फाउंडेशन द्वारा ‘रविवार- अवकाश के मायने’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
रविवार-अवकाश का सदुपयोग पूरी जीवंतता से रचनात्मकता, समाजसेवा व मानवता के रक्षार्थ करें- डा शंभू शरण

पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का कार्य कर रविवार-अवकाश का करें सद्प्रयोग- प्रो अजीत सिंह
*रविवार खुशनुमा एहसास, जिसका उपयोग कृत्यकार्यों की समीक्षा,भावी योजना निर्माण, चिंतन- मनन व राष्ट्रसेवा में हो- डा चौरसिया*
*मजदूर नेता मेघाजी लोखंडे के प्रयास से भारत में 10 जून, 1890 से रविवार को साप्ताहिक अवकाश की शुरुआत हुयी- डा सुनीता*
सी एम कॉलेज, दरभंगा के इग्नू अध्ययन केन्द्र तथा डा प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में “रविवार- अवकाश के मायने” विषयक ऑनलाइन व ऑफलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन महाविद्यालय परिसर में किया गया। इग्नू क्षेत्रीय केन्द्र के निदेशक डा शंभू शरण सिंह की अध्यक्षता में आयोजित वेबीनार में मुख्य अतिथि के रूप में मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव एवं विश्वविद्यालय वाणिज्य विभागाध्यक्ष प्रो अजीत कुमार सिंह, इग्नू समन्वयक डा अनिल कुमार, डा शिशिर कुमार झा, प्रशांत कुमार झा व डा कीर्ति चौरसिया, मारवाड़ी कॉलेज से डा सुनीता कुमारी व डा विकास सिंह, डा नमीश कुमार चौधरी, संजीव कुमार, राजकुमार गणेशन, अनिल कुमार सिंह, श्वेता झा, अभिषेक कुमार, आरती कुमारी, अमरजीत कुमार, सुभाष पंडित, रवीन्द्र चौधरी, सतीशचंद्र पाठक, सुरेश पासवान, मो शुहैल आलम, मुकेश कुमार झा, अरविंद कुमार, आभा मिश्रा, सुशील कुमार, ओम प्रकाश झा व डा आर एन चौरसिया सहित 50 से अधिक व्यक्तियों ने भाग लिया।
डॉ शंभू शरण सिंह ने कहा कि श्रम मंत्रालय के निर्देशानुसार सप्ताह में 40 घंटे काम करने का प्रावधान है। रविवार- अवकाश का सदुपयोग पूरी जीवंतता से रचनात्मकता, कलात्मकता, समाजसेवा व मानवता के रक्षार्थ करना चाहिए। छात्र रविवार का उपयोग अपने पाठ्यों की पुनरावृति तथा क्रिएटिविटी के लिए जरूर करें। उन्होंने रविवार अवकाश के महत्व की चर्चा करते हुए कहा कि औद्योगिक क्रांति के बाद जब से सेवा मूल्य आधारित हुई, तब से साप्ताहिक अवकाश की आवश्यकता ज्यादा महसूस हुई। वास्तव में रविवार हैप्पी वीकेंड है, जिसका उपयोग हम मनचाहे ढंग अपने परिवार, समाज व संबंधियों के लिए कर सकते हैं।
मुख्य अतिथि प्रो अजीत कुमार सिंह ने कहा कि सातों दिन नियमवद्ध कार्य करने से व्यक्ति तनावग्रस्त और बीमार हो सकता है, पर रविवार को आराम कर पुनः तरोताजा होकर अधिक क्षमता से बेहतर कार्य कर पाता है। उन्होंने आह्वान किया कि हमें पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, स्वच्छता व स्वास्थ्य का कार्य कर रविवार- अवकाश का सदुपयोग करना चाहिए। वर्तमान समय में रविवार-अवकाश की प्रासंगिकता और बढ़ गई है, क्योंकि पति पत्नी दोनों नौकरी करने लगे हैं। रविवार सूर्य का दिन भी होता है जो संपूर्ण ब्रह्मांड के ऊर्जा का मूल स्रोत है। प्रोफेसर सिंह ने रविवार के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व की विस्तार से चर्चा करते हुए इसे स्वतंत्र, स्वास्थ्यकर एवं जीवन का उद्धारक बताया।
विशिष्ट अतिथि के रूप में मारवाड़ी महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष डा सुनीता कुमारी ने रविवार को अपना दिन बताते हुए पेंडिंग कार्यों को संपन्न करने का दिन बताया। उन्होंने भारत में मजदूर नेता नारायण मेघाजी लोखंडे के प्रयास से भारत में 10 जून, 1890 से अंग्रेज सरकार द्वारा रविवार के दिन को अवकाश घोषित करने की चर्चा की।
सम्मानित अतिथि के रूप में मिल्लत कॉलेज के मनोविज्ञान की प्राध्यापिका डा कीर्ति चौरसिया ने रविवार- अवकाश के मनोवैज्ञानिक पक्षों की चर्चा करते हुए कहा कि इस दिन का उपयोग हम रिलैक्स होकर गुणवत्तापूर्ण समय देकर आराम से कर पाते हैं। इस दिन हम अनौपचारिक रूप से बेहतर कार्य भी करते हैं और पुनः आगे के लिए ऊर्जा संचय भी कर पाते हैं।
आगत अतिथियों का स्वागत एवं विषय प्रवेश कराते हुए संगोष्ठी के संयोजक एवं इग्नू समन्वयक डा आर एन चौरसिया ने कहा रविवार खुशनुमा एहसास है, जिसका उपयोग हम अपने कृत्य कार्यों की समीक्षा, भावी कार्ययोजना- निर्माण तथा चिंतन- मनन व राष्ट्रसेवा में कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि विश्व के अधिकांश देशों में रविवार को साप्ताहिक अवकाश रहता है, जबकि कहीं-कहीं शुक्रवार एवं शनिवार को भी अवकाश रहता है।
फाउंडेशन के सक्रिय कार्यकर्ता राजकुमार गणेशन के संचालन में आयोजित संगोष्ठी में धन्यवाद ज्ञापन इग्नू के सहायक समन्वयक डा सुशील कुमार झा ने किया।
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