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मारवाड़ी महाविद्यालय में आयोजित की गई रंगोली प्रतियोगिता

छात्र – छात्राओं की कुशलता को आगे बढ़ाने में प्रतियोगिताएं अत्यंत सहायक हैं – डा कन्हैया जी झा

लोकरंग का अद्भुत सौंदर्य है रंगोली – डा विकास सिंह

मारवाड़ी महाविद्यालय में आयोजित की गई रंगोली प्रतियोगिता

विभिन्न विचारों, कल्पनाओं और भावनाओं को साकार रूप रंगोली से दिया जा सकता है – डा सुनीता कुमारी

मारवाड़ी  महाविद्यालय स्तरीय रंगोली प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। यह प्रतियोगिता ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती समारोह के उपलक्ष्य में रखी गई। रंगों से सौंदर्य को बढ़ाने वाली इस प्रतियोगिता में महाविद्यालय की हर्शा रानी, राधा कुमारी, खुशबू कुमारी, राखी कुमारी, परी कुमारी, निशा कुमारी, शिल्पी कुमारी, सोनाली कुमारी और आदित्य कुमार झा आदि छात्र – छात्राओं ने भाग लिया। रंगोली प्रतियोगिता में प्रथम स्थान आदित्य कुमार झा, द्वितीय स्थान परी कुमारी, और तृतीय स्थान निशा कुमारी ने प्राप्त किया।

रंगोली प्रतियोगिता का उद्घाटन करते हुए प्रभारी प्रधानाचार्य डा कन्हैया जी झा ने कहा कि इस वर्ष हमारा विश्वविद्यालय स्वर्ण जयंती वर्ष समारोह मना रहा है जिसके तहत विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं। छात्र – छात्राओं की कुशलता को आगे बढ़ाने में ये प्रतियोगिताएं अत्यंत सहायक हैं। विभिन्न प्रतियोगिताएं सांस्कृतिक धरोहर को अकादमिक स्तर पर नई पीढ़ी को सहेजने और संवारने के लिए प्रेरित करती हैं। 15 अगस्त के कार्यक्रम में विजेता छात्र – छात्राओं को सम्मानित किया जाएगा।

महाविद्यालय के बर्सर डा अवधेश प्रसाद यादव ने कहा कि 25 जुलाई से आरंभ हुई प्रतियोगिताएं 3 अगस्त तक अनवरत चलेंगी। कोई भी कार्यक्रम छात्र – छात्राओं की अधिकाधिक सहभागिता से सफल होता है। रंगोली सौभाग्य का प्रतीक है। मैथिली विभागाध्यक्ष डा अरविंद झा ने कहा कि हमारे सभी शिक्षक महाविद्यालय के विकास में विभिन्न ढंग से कार्यक्रमों का संचालन करते हैं। विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित रंगोली प्रतियोगिता के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि रंगोली मिथिला की जीवंत परंपरा रही है जो विभिन्न पर्वों पर बनाई जाती है। रंगों का चयन और संयोजन ही रंगोली का मूल आधार है।

रंगोली प्रतियोगिता की संयोजिका और समाजशास्त्र विभागाध्यक्षा डा. सुनीता कुमारी ने प्रतियोगिता संबंधी विभिन्न नियमों का निर्देश छात्र – छात्राओं को दिया। उन्होंने कहा कि लोक की कलाओं को रंगों से उकेरने के लिए और उन्हें संरक्षण देने के लिए इस तरह के कार्यक्रम अत्यावश्यक हैं। रंगोली बनाते वक्त लोकगीत गाने का भी रिवाज़ कई जगह देखा जाता है। विभिन्न विचारों, कल्पनाओं और भावनाओं को साकार रूप रंगोली से दिया जा सकता है। रंगोली प्रतियोगिता समिति के संयोजक सदस्य अंग्रेजी विभाग के शिक्षक डा परमेंद्र मिश्र, डा. निशा कुमारी और दर्शन विभाग की डा कृष्णा थीं।

कार्यक्रम में निर्णायक की भूमिका संस्कृत विभागाध्यक्ष डा.विकास सिंह, मनोविज्ञान की विभागाध्यक्षा डॉ.कविता कुमारी और मनोविज्ञान के ही सहायक प्राध्यापक डा.सुभाष कुमार सुमन ने निभाई। डा.कविता कुमारी ने कहा कि छात्र छात्राओ को अपने अंदर के हुनर को बाहर लाने के लिए इस तरह की प्रतियोगिता मे भाग लेते रहना चाहिए। रंगोली मूलतः महाराष्ट्र की कला है और आज सर्वत्र व्याप्त हो गई है। रंगोली प्रत्येक शुभ अवसर पर बनाई जाती है और इसे लक्ष्मी से जोड़ा जाता है। डा सुभाष कुमार सुमन ने कहा कि मानवीय मन की भावनाओं को रंग से उकेरना ही रंगोली है।

डा.विकास सिंह ने कहा कि लोकरंग का अद्भुत सौंदर्य रंगोली है। लोक संस्कृति में पूर्वजों से मिली हुई कलात्मक सृजना की विरासत में से एक है रंगोली। इसे सीखने के लिए किसी को भी विधिवत प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है। यह तो विरासत में हमें मिलने वाली परंपरा है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी स्वत: ही देखते ही देखते सीख जाती है। भारत की सभी धार्मिक परंपराओं में रंगोली बनाना शुभ माना जाता है। इस कला के आदिम संदर्भ हम प्रागैतिहासिक काल की गुफाओं में बने विभिन्न चित्रों में देख सकते हैं। प्रत्येक तीज – त्यौहार पर रंगोली बनाने का प्रचलन भारत में है। रंगोली बनाने से सकारात्मक ऊर्जा का सृजन होता है और आध्यात्मिक उत्साह बना रहता है।

कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन महाविद्यालय के अंग्रेजी के सहायक प्राध्यापक डा परमेंद्र मिश्र ने किया। प्रतियोगिता में महाविद्यालय के डा.अमित कुमार सिंह, डा.अंकित कुमार सिंह, डा.अनुरूद्ध कुमार सिंह, डा शकील अख्तर, डा.संजय कुमार, डा.अमरेंद्र कुमार झा, डा.गजेन्द्र भारद्वाज, आनंद शंकर, सौरभ सुमन, डा.श्यामानंद चौधरी, डा.नीरज तिवारी, डा.रवि कुमार राम, डा.अभय कुमार पाठक, डा.एम. एच. खान, डा सुरेंद्र कुमार गुप्ता, डा.अरविंद कुमार आदि उपस्थित थे।

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