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महिला आजादी और बराबरी की दावेदारी को मजबूत करने के संकल्प के साथ ऐपवा, बिहार का 8वाँ राज्य सम्मेलन दरभंगा मे शुरू

महिला आजादी और बराबरी की दावेदारी को मजबूत करने के संकल्प के साथ ऐपवा, बिहार का 8वाँ राज्य सम्मेलन दरभंगा मे शुरू

लोकतंत्र को बचाने के लिए आधी आबादी को आगे आना होगा – मीना तिवारी

यह सम्मेलन न्याय, लोकतंत्र, समानता सौहार्द को मजबूत बनाएगा- कुसुम वर्मा

समाज के किसी तीन काम मे दो काम महिला निष्पादित करती है – मंजू वर्मा

दरभंगा अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोशिएशन (ऐपवा) का 8 वाँ राज्य सम्मेलन दरभंगा में झंडोतोलन व शहीदों के श्रधांजलि देकर खुला सत्र का शुरआत किया गया।

सम्मेलन की अद्यक्षता सरोज चौबे, अनिता सिन्हा, सोहिला गुप्ता, इंदु सिंह, जूही आलम,माधुरी गुप्ता, शनिचरी देवी, सावित्री देवी, रेणु देवी, सीता पाल ने किया। खुला सत्र का संचालन ऐपवा राज्य सचिव शशि यादव ने किया।
सम्मेलन के अवसर पर सभी अतिथियों का मिथिला पेंटिंग सारी देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीणा तिवारी ने इस अवसर पर कहा कि विकास की एक मिथ्याचेतना के सहारे आज हमारे देश को प्रतिगामी ताकतें दमनकारी, शोषणकारी व्यवस्था की ओर ले रही है। अभी तीन दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने महिलाओं के पोशाक पर टिप्पणी करते हुए पहनने-ओढ़ने के मौलिक अधिकार मखौल बनाया। न्यायधीशों की जिम्मेदारी है कि वो कानूनों की सही व्याख्या करें लेकिन वे किस तरह की व्याख्या कर रहे हैं? भँवरी देवी के केस में भी कोर्ट का रवैय्या समाज देख चुका है। यह कौन-सी सोच है? कौन-सी विचारधारा है? इसको चिन्हित करना होगा।

बिल्किस बानो को किन दुर्गम रास्तों पर चल कर न्याय मिला था , हम जानते हैं। इस 15 अगस्त को प्रधानमंत्री जब लाल किले से महिला सम्मान की शेखी बघार रहे थे उसी समय बिल्किस के गुनहगारों, बलात्कारियों को, नरसंहारियों को रिहा किया जा रहा। उनके न्याय की लड़ाई लड़ने वाली तीस्ता सीतलवाड़ को झूठे केस में फंसा कर जेल में बंद कर देती है ये सरकार आशाराम बापू, राम-रहीम जैसों के चरणों में नतमस्तक होने वाले लोग जो आज सत्तारूढ़ हैं मनुस्मृति के हिसाब से देश चला रहे उसके ये चंद उदाहरण हैं।
आगे श्रीमती तिवारी ने कहा कि देश में अमीर और गरीब के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही, तमाम संसाधनों पर कुछ मुट्ठी भर लोगों का कब्जा है। आज भी देश के 70 फीसदी लोगों को पोषणयुक्त आहार नहीं मिलता। स्त्रियों सबसे अधिक खून की कमी का शिकार हैं। यह कैसा विकास का मॉडल है?
आगे उन्होंने कहा कि बाल विवाह, दहेज प्रथा, स्त्री-उत्पीड़न के खिलाफ केवल कानून बनाने से नहीं होगा। वे कौन-सी जीवन परिस्थियां हैं उन्हें समझना होगा।
शराबबंदी के नाम पर हाशिये के समाज को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा। जबकि ठेकेदार, माफिया मालामाल हो रहे। ये तमाम मुद्दे हैं जिन पर बिहारमें संघर्ष करने की जरूरत है।

अंत में ऐपवा राष्ट्रीय महासचिव ने कहा कि कॉमन सिविल कोड से ज्यादा जरूरी महिलाओं के सम्मान, बराबरी की गारंटी की जानी चाहिए। इन तमाम परिस्थितियों में संघर्ष को तेज करना होगा। यह महिलाओं के संगठित हुए बिना संभव नहीं है।

इस राज्य सम्मेलन की केंद्रीय पर्यवेक्षक ऐपवा उत्तर प्रदेश की राज्य सचिव कुसुम वर्मा ने प्रतिरोध की शक्ति के रूप में स्त्रियों को रेखांकित करते हुए आगे कहा कि आज पूरे देश में स्त्रियाँ दमन,शोषण, उत्पीड़न के खिलाफ सड़को पर हैं। चाहे बिलकिस बानो के न्याय के सवाल पर हो, तीस्ता सीतलवाड़ की रिहाई को लेकर,महंगाई के खिलाफ अभी कल 12 सितंबर को उत्तर प्रदेश में हजारों ‘आशा’ वर्कर्स एकजुट हो रहीं हैं अपने हक़-हुक़ूक़ के लिए।

महिला आयोग की पूर्व राज्य अध्यक्ष ऐपवा नेत्री मंजू प्रकाश ने सम्मेलन में राज्यभर से आये तमाम साथियों का स्वागत करने के साथ ही कहा कि जैविक दृष्टि से भी महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मजबूत मानी जाती हैं। अगर समाज में तीन काम निष्पादित होते हैं तो उसमें दो काम स्त्रियाँ करती हैं, एक पुरुष। न्यूनतम मजदूरी के तहत 8 घंटे काम का लिमिट है लेकिन महिलाओं के काम की कोई लिमिट ही नहीं है। एक करवट हम माँ बनते हैं, एक करवट पत्नी। हमारे काम का अंत ही नहीं है। हमारी सबसे बड़ी लड़ाई है कि हम स्त्री और पुरुष से पहले इंसान हैं। न पुरुष हमारे दुश्मन हैं न स्त्री। यह सामंतवादी व्यवस्था हमारी दुश्मन है। समाज के पूर्वाग्रहों की परवाह न करते हुए संविधान प्रदत्त अधिकारों के रास्ते आगे बढ़ते जाएँगे।

मुख्य वक्ता के बतौर सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रतिमा इंगहपि ने कहा कि बिहार में महिला अधिकारों की जो लड़ाई चल रही है उसको मैं सलाम करती हूँ।
बिहार के चुनावों में 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व बिहार की महिलाओं के लिए, ऐपवा के लिए एक जीत है।
हम देख रहे हैं आंगनबाड़ी, आशा, रसोइया आदि को सरकार मजदूरी भी ससमय नहीं देती। अगर देती है तो पुरषों के मुकाबले आधा वेतन। यह भी सरकार का एक शोषण है।
आज पब्लिक सेक्टर को ख़तम करके अम्बानी-अडानी को लाने का प्रयास किया जा रहा है। फिर से साम्राज्यवाद लाया जा रहा। यह भाजपा सरकार देश को श्रीलंका सरीखे किसी गहरे संकट की ओर ले जा रही। इस सम्मेलन से हम संकल्प लें कि 2024 में हम आधी आबादी इस फासिस्ट भाजपा सरकार को सत्ता से ही नहीं बल्कि जनमानस से भी दूर करेंगे।

कार्यक्रम में अतिथि के रूप में उपस्थित किसान महासभा के बिहार राज्य अध्यक्ष विशेश्वर यादव ने कहा कि ऐपवा न केवल महिलाओं के लिए बल्कि पूरे देश और समाज में जो आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी लाड़ दी गई है उसके खिलाफ संघर्षों में शामिल रही।
कृषि कानूनों के खिलाफ हुए आंदोलनों में भी महिलाओं की भागीदारी से उन काले कानूनों की वापसी के लिए सरकार को झुकना पड़ा।
सरकार तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं में कटौती कर रही है। खाद्य सुरक्षा, फसलों का न्यूनतम समर्थित मूल्य, कर्ज माफी आदि के आंदोलन में भी स्त्रियों का विशेष योगदान है। हम सब मिलकर जनांदोलनों को तीव्र करेंगे।

इस अवसर पर आइसा के कार्यकारी राष्ट्रीय महासचिव प्रसेनजीत कुमार ने कहा कि नई शिक्षा नीति आधुनिक मनुस्मृति है। उस दस्तावेज में स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों की कैसे बड़ी भागीदारी हो इसपर एक शब्द नहीं है। कैम्पसों में महिलाओं की हित संरक्षण के लिए बने संस्थओं को बंद किया जा रहा। यह महिलाओं को कैंपस से बेदखल करने की राजनीति है। हम इस दमनकारी नीति का इस मंच से खुला विरोध करते हैं।

इस अवसर पर मीरा दी, बंदना सिंग, साधना शर्मा, रेणु मंडल, मंजिता, सुलेखा, रानी सिंह, अफ़सा जवी, सहित दर्जनों वक्ता ने संबोधित किया।
सम्मेलन में जसम दरभंगा की ओर से मृत्युंजय कुमार, सबा रौशनी, ज्योति प्रकाश आदि कलाकारों ने जनवादी गीतों की प्रस्तुति की।

 

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