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मणिशृंखला की 34वीं पुस्तक का मंत्री संजय झा के हाथों हुआ विमोचन

मणिशृंखला की 34वीं पुस्तक का मंत्री संजय झा के हाथों हुआ विमोचन

मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान के नौवें स्थापना दिवस के समापन समारोह में मंत्री ने किया मातृलिपि को अपनाने का आह्वान

10वीं शताब्दी और इसके बाद के अनेक शिलालेख एवं पांडुलिपि में मिथिलाक्षर सशक्त रूप में दर्ज हैं। इससे पता चलता है कि मिथिला की धरोहर लिपि मिथिलाक्षर का अस्तित्व सदियों से रहता आया है। बीच के एक संक्षिप्त कालखंड में भले ही इसकी स्थिति थोड़ी निराशाजनक रही हो, लेकिन एक बार फिर से मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान के अथक प्रयास से धरोहर लिपि मिथिलाक्षर को लेकर आम मैथिल में चेतना जागृत हो गई है। यह निश्चित रूप से इसके सुखद भविष्य के लिए शुभ संकेत हैं।
यह बात बिहार सरकार के जल संसाधन एवं सूचना व जनसंपर्क मंत्री संजय कुमार झा ने रविवार को मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान के नौवें स्थापना दिवस के अवसर पर वर्चुअल मोड में आयोजित हो रहे पाक्षिक समारोह का समापन करते हुए कही। शहर के शुभंकरपुर स्थित श्मशान काली मंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान के स्थापना दिवस पर हम सब कम से कम मिथिलाक्षर में अपना नाम लिखने का संकल्प लें एवं साथ मिल कर इसके संरक्षण, संवर्धन एवं विकास के लिए काम करें।
मौके पर उन्होंने मणिशृंखला अंतर्गत महात्मा गाँधी शिक्षण संस्थान दरभंगा द्वारा प्रकाशित वरिष्ठ साहित्यकार मणिकांत झा रचित भक्ति गीतों के संग्रह भवानीमणि का भी लोकार्पण किया। अपने संबोधन में उन्होंने कोजागरा के अवसर मणिकांत झा के 34वें रचना पुष्प के रूप में प्रकाशित भवानीमणि को मैथिली भक्ति साहित्य के लिए अनुपम उपहार बताते कहा कि उन्हें विश्वास है कि उनकी रचनाएं देवी भक्ति की सतरंगी छटा बिखेरेगा।
इससे पहले मंत्री ने विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू, पूर्व मेयर ओमप्रकाश खेड़िया, पूर्व प्रधानाचार्य डॉ विद्यानाथ झा, मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान के संस्थापक पं अजय नाथ शास्त्री एवं मणिकांत झा के साथ दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया। मौके पर डॉ बैजू ने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से मिथिला की धरोहर लिपि को पुनर्जीवित करने का अभियान चलाकर पं अजय नाथ शास्त्री ने ऐसा नेक कार्य किया है, जिसके लिए मिथिला के इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरमें लिखा जाएगा। मणिकांत झा द्वारा मैथिली में रचित भवानीमणि को उन्होंने मिथिला में भगवती अराधना की पुरातन संस्कृति का संवाहक बताया।
ओमप्रकाश खेड़िया ने मृतप्राय हो चुकी मिथिला की धरोहर लिपि मिथिलाक्षर को पुनर्जीवित करने में मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान की भूमिका की सराहना करते हुए मणिकांत झा के रचना संग्रह को मैथिली भक्ति साहित्य जगत को मजबूती प्रदान करने वाला बताया। डॉ विद्यानाथ झा ने अमृत पर्व के रूप में विख्यात कोजागरा पर्व के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम को मिथिला की मातृभाषा व मातृलिपि दोनों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण करार दिया।
मणिकांत झा ने मणिशृंखला की सफलता के लिए आम मैथिल जन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते कहा कि यदि हम अपनी मातृलिपि मिथिलाक्षर का प्रयोग दैनिक कार्यों में नहीं करेंगे तो वह पुनः मृत प्राय हो जाएगी। अपने संबोधन में उन्होंने मिथिला के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से इसे अपनाकर इसके प्रचार-प्रसार के लिए आगे आने का आह्वान किया। पं अजय नाथ शास्त्री ने कहा कि संविधान में शामिल अधिकतर भाषाओं को जहां अपनी स्वतंत्र लिपि नहीं है। ऐसे में हमारी धरोहर लिपि मिथिलाक्षर मैथिली को विशिष्टता प्रदान करती है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर मिथिलाक्षर की पाठशाला सजाकर देश-विदेश के अब तक करीब दस लाख लोगों को मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान के माध्यम से मिथिलाक्षर में साक्षर बनाया जा चुका है। लेकिन मिथिलाक्षर को चलन में लाना संपूर्ण मिथिलावासी की जिम्मेवारी है।
समारोह में गंधर्व कुमार झा ने वेद ध्वनि प्रस्तुत किया। जबकि दीपक कुमार झा एवं जया ने भवानीमणि से सस्वर प्रस्तुति दी। धन्यवाद ज्ञापन मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान के वरिष्ठ संरक्षक प्रवीण कुमार झा ने किया। कार्यक्रम में डॉ जयप्रकाश चौधरी जनक, पं विष्णु देव झा विकल, विष्णु कुमार झा, डॉ अशोक कुमार झा, महेश कुमार झा, नवल किशोर झा, अशोक चौधरी, गंगेश मिश्र, सुभाष झा, रंजीत झा, संजय कुमार झा, संतोष कुमार झा, नीलम झा, पूनम झा, कंचना झा, वंदना झा आदि की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

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