04 दिसम्बर को पृथक मिथिला राज्य के लिए पटना में होगा आंदोलन – एमएसयू   

04 दिसम्बर को पृथक मिथिला राज्य के लिए पटना में होगा आंदोलन – एमएसयू

मिथिला स्टूडेंट यूनियन द्वारा 04 दिसम्बर को पटना में होने वाले पृथक मिथिला राज्य हेतु आंदोलन को लेकर प्रेस वार्ता का आयोजन एमएसयू कार्यालय पर आयोजित किया गया । प्रेस वार्ता का नेतृत्व कार्यालय प्रभारी मुरारी मिश्रा ने किया।

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए प्रदेश अध्यक्ष सह जिप सदस्य अमित कुमार ठाकुर ने कहा कि  : मिथिला राज्य की मांग बहुत पुराना है लेकिन आजतक इसपर संगठित प्रयास नहीं हो सका। इस बार MSU ने संगठित प्रयास शुरू किया है । नीति आयोग के रिपोर्ट में अभी हाल में जारी हुआ था की बिहार के 17 सबसे गरीब और पिछड़े जिले मिथिला क्षेत्र में है। GDP ग्रोथ के हिसाब से हो अथवा प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक उत्पादन की बात हो अथवा कृषि उत्पादन, शिक्षा दर हो अथवा ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स, शहरीकरण की बात हो या पलायन अथवा अन्य कोई भी वैकाशिक मापदंड…मिथिला क्षेत्र पूरे देश में सबसे पीछे है। बाढ़ जैसी आपदा झेलने वाला 6 करोड़ से अधिक जनसंख्या का यह क्षेत्र सिर्फ सस्ता मजदूर सप्लाई करने वाला लेबर जोन है देश के लिए। नया मिथिला राज्य बनेगा तो संवैधानिक और नैतिक रूप से मजबूरी होगी केंद्र के लिए की नए गठित राज्य को स्पेशल पैकेज अथवा केंद्रीय सहायता दे। नया राज्य बनेगा तो स्वाभाविक रूप से नई राजधानी बसेगी। नए राजधानी में इन्फ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट होगा, भवन-सड़कें-संस्थान-रेल-मेट्रो आदि बनेगा, प्राइवेट इन्वेस्टमेंट आएगा, कंपनीज आएगी, लाखों की संख्या में नया रोजगार उत्पन्न होगा। नए राज्य के बनने से प्रशासनिक सुगमता हेतु नए जिले बनेंगे, नए प्रखंड नया थाना और अनुमंडल सब बनेगा। इनके बनने से ग्रामीण क्षेत्रों तक विकास की नई धारा बनेगी।

जब आप नया राज्य बनाएंगे तो स्वभाविक है की नई शुरुआत करनी होगी। आप स्वाभाविक रूप से नए राजस्व एवं राजकीय आमदनी का साधन तलाशेंगे, नए मौके ढूंढेंगे। तब बाढ़ किसी राज्य के कुछ जिलों की समस्या नहीं रहेगी बल्कि आपके पूरे राज्य की समस्या रहेगी, स्वाभाविक रूप से राजनीतिक नेतृत्व बाढ़ के स्थाई समस्या पर काम करेगा।

*मिथिलावादी नेता विद्या भूषण राय ने संबोधित करते हुए कहा कि*

-भौगौलिक , आर्थिक , ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से मिथिला के पास एक राज्य की सारी योग्यताएं हैं । दुर्भाग्य की बात है कि भारत की स्वतंत्रता के समय ही इसे राज्य का दर्जा प्रदान नहीं किया गया । परिणामस्वरूप स्वतंत्रता के पूर्व तथा बाद से कुछ वर्षों में जो इसका आर्थिक ढांचा था धीरे – धीरे वह भी नष्ट हो गया । शोषण तथा उपेक्षा इतनी बढ़ती गई कि सारे उद्योग – धंधे समाप्त हो गए तथा उससे सम्बंधित कृषि का विनाश होता गया । प्रतिवर्ष बाढ़ एवं अकाल के तांडव तथा राजनेताओं के खोखले आश्वासन , छलावा एवं शोषण यहाँ की नियति बन गई । अतः अगर शोषण तथा विकास को आधार मानकर राज्यो का निर्माण होता रहा है तो भी मिथिला राज्य का निर्माण परमावश्यक एवं समयानुकूल है । राज्य स्थापना के बाद ही इस क्षेत्र के सर्वागीण विकास की बात सोची जा सकती है । कृषि , उद्योग-धंधा , पर्यटन , शिक्षा एवं संस्कृति के विकास से ही इस क्षेत्र की दुर्दशा तथा बेरोजगारी का अंत हो सकता है तथा लोगों को पलायन रुक सकता है । भाषा, लिपि, क्षेत्र, जनसंख्या और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के मानक पर खरा उतरते हुए मिथिला पूर्ण राज्य बनने का अधिकार रखता है। मिथिला के सर्वांगीण उन्नयन एवं अभ्युत्थान के लिए एक मात्र विकल्प मिथिला राज्य ।
मिथिला के सांस्कृतिक धरोहर की उपेक्षा का दुष्परिणाम यह निकला कि वैशाली को छोड़कर एक भी ऐतिहासिक एवं पुरातत्विक स्थल पर न ही पूर्ण उत्खनन कराया गया न ही अन्वेषण । परिणामस्वरूप यहां कि धरोहर मिट्टी में ही दबी रह गयी तथा पर्यटन उद्योग का विकास न हो सका । बलिराजगढ़(मधुबनी) , कोपगढ़(दरभंगा) , पांडवस्थान ( समस्तीपुर) , नौलागढ़ एवं जयमंगलागढ़ (बेगूसराय) , कटरागढ़ (मुजफ्फरपुर) , बनगाँव(सहरसा) जैसे दर्जनों स्थलों की प्राचीनता नालंदा , विक्रमशिला , राजगीर , बोधगया आदि से किसी भी तरह कम नही है , किंतु इसकी उपेक्षा हमेशा होती रही ।

प्राचीन मंदिर बड़े तालाब , चौर ,नदी तथा दरभंगा राज के किले , मंदिर एवं अन्य संरचनाओं को पर्यटक स्थल के रुप में विकसित किये जाते तो मिथिला का परिदृश्य कुछ और ही होता ।

*राष्ट्रीय प्रवक्ता अमन सक्सेना ने कहा कि :*

विविध पुरातात्विक अन्वेषण तथा उत्खननों से प्राप्त मूर्तियाँ , लघुमूर्तियाँ , मनके मूर्तियां के फलकें , मुहरें आदि इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण है । दरभंगा राज द्वारा दरभंगा , राजनगर तथा अन्य स्थानों में निर्मित मंदिरों एवं अन्य भवन तत्कालीन स्थापत्य कला की अनुपम देन है । दुर्भाग्य की बात है कि उन स्मारकों की रक्षा सरकार करने में अक्षम है तथा पुरातत्व विभाग भी उसकी उपेक्षा करती रही है। सारे स्मारक ध्वस्त होते चले जा रहे है तथा वास्तुकला की निशानी मिटती चली जा रही है ।

*राष्ट्रीय सोसल मीडिया प्रभारी उदय नारयण झा ने कहा कि -* मिथिला की लोक-कलाओं ने तो अंतराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की । शामाचकेवा , जट-जटिन , चित्रकारी आदि को बड़ी प्रसिद्धि मिली लेकिन इसके संरक्षण के लिए सरकार की ओर से कोई व्यवस्था नही की गई । मिथिला चित्रकारी को जापान में प्रतिष्ठा मिली जहाँ इसके लिए संग्रहालय की स्थापना कर मिथिला के कलाकारों को सम्मानित किया गया । लेकिन यहाँ की सरकार को यह सौभाग्य नहीं प्राप्त हो सका कि इस दिशा में कुछ कर सके तथा कला की कीमत पाने के लिए एक स्थायी बाजार का निर्माण कर विदेशी पर्यटकों से इन्हें उचित परिश्रमिक दिलवा सकें । अंतराष्ट्रीय बाजार में मिथिला पेंटिंग्स की मांग बढ़ जाने के कारण इसमें अनेक बाहरी कलाकार भी शामिल हो गए है जिसे इस चित्रकारी के मूल स्वरूप में विकृतियों के मूल स्वरूप में विकृतियों भी आयी हैं।

इस प्रेस वार्ता में नगर अध्यक्ष अर्जुन दास , अविनाश सहनी की उपस्थिति रही।

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