अपनों से अपने घर में हारी है हिंदी : प्रो. प्रभाकर पाठक
सीएम साइंस कॉलेज में हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित हुआ एकल व्याख्यान कार्यक्रम

वर्तमान युग में हिंदी की दशा भले ही उतनी अच्छी ना दिखती हो, लेकिन इसकी दिशा बहुत ही सशक्त है। आज जहां हिंदी का अपना वैश्विक बाजार है वहीं, विश्व स्तर पर हिंदी की सृजनशीलता का बोलबाला है। उक्त बातें ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष सह पीजी हिंदी विभाग के सेवानिवृत अध्यक्ष प्रो प्रभाकर पाठक ने शनिवार को हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर सीएम साइंस कॉलेज में आयोजित एकल व्याख्यान में कही। ‘हिंदी: घर और बाहर’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में उन्होंने कहा कि हिंदी अगर किसी से हारी है तो वह अपनों से हारी है। वह अपने घर में हारी है। वरना, हिंदी साहित्य का क्षितिज इतना विशाल है कि इसे हराना उतना आसान नहीं है। अपने व्याख्यान में उन्होंने बताया कि किस प्रकार 1857 के बाद भारतेंदु ने सर्वप्रथम खड़ी बोली के रूप में हिंदी का सूत्रपात किया। उन्होंने इसकी सृजनशीलता को स्थापित किया। हिंदी का धीरे-धीरे यहां विकास हुआ। उन्होंने कहा कि आज विश्व की जनसंख्या साढे सात अरब है। लेकिन इसमें बमुश्किल एक व्यक्ति हिंदी जानता होगा। बावजूद इसके हिंदी को कमतर कर नहीं आंका जा सकता है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में हिंदी की विडंबना है यहां अंग्रेजी पर अधिक ध्यान दिया जाता है। जबकि वास्तविकता यही है कि हिंदी अंग्रेजी किसी रूप में कम नहीं है।अंग्रेजी में यदि किसी ने शेक्सपियर को पढ़कर सब कुछ पढ़ लिया तो उसी प्रकार तुलसीदास की कृति हिंदी के लिए अत्यंत सुखद है। इन दोनों में समान्यता है कि दोनों ने 16वीं सदी में ही अपनी सृजनशीलता से लोकप्रियता हासिल की। प्रो. पाठक ने हिंदी को महान बनाने में विवेकानंद के अहम योगदान को विस्तार से रेखांकित किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रधानाचार्य प्रो. संजीव कुमार मिश्र ने कहा कि हिंदी हमारी आत्मा ही नहीं, हमारी अस्मिता है। यह मिथक है कि विज्ञान के छात्र साहित्य के प्रेमी नहीं होते, इस दिशा में नेहरू से लेकर चेतन भगत तक का उदाहरण हमारे सामने मौजूद है। उन्होंने कहा कि हिंदी में अभी भी उतना ही काम हो रहा है, जितना कि अंग्रेजी में। आज हिंदी इंटरनेट और सोशल मीडिया में प्रयुक्त होने वाली विश्व की दूसरी भाषा है। भारत ही नहीं विश्व के 133 देशों में हिंदी का न सिर्फ सशक्त प्रयोग हो रहा, बल्कि 70 देशों के 150 विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में हिंदी भाषा को शामिल किया गया है। उन्होंने हिंदी को विकास की मुख्य धारा से जोड़े रखने में प्रवासी भारतीय के योगदानों की चर्चा करते हुए हिंदी को अतीत का धरोहर मानने की बजाय इसे भविष्य का दर्पण मानने का आह्वान किया। अपने संबोधन में उन्होंने हिंदी को क्लिष्टता और कृत्रिमता से बचाने की सलाह दी.
मैथिली विभाग के अध्यक्ष डॉ सत्येंद्र कुमार झा एवं अंग्रेजी विभाग की शिक्षिका डॉ ऋचा कुमारी के संयुक्त संचालन में आयोजित एकल व्याख्यान में धन्यवाद ज्ञापन अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ युगेश्वर साह ने किया। अतिथियों का स्वागत आयोजन सचिव सह हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ दिनेश प्रसाद साह ने किया। मौके पर शुक्रवार को आयोजित भाषण प्रतियोगिता में अव्वल आए प्रतिभागियों के बीच प्रमाण पत्र एवं मेडल का वितरण भी किया गया।
Darbhanga News24 – दरभंगा न्यूज24 Online News Portal