दरभंगा में ‘स्पंदन कथक संध्या 2025’ का भव्य आयोजन
दरभंगा। नित्यार्पण कला आश्रम के तत्वावधान में स्पंदन कथक संध्या 2025 का आयोजन रविवार को सीएम साइंस कॉलेज परिसर में किया गया। शाम 5 बजे आरंभ हुए इस कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका दामिनी मिश्रा के द्वारा राग मधुवंती और भजन से हुआ, जिसने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

मुख्य अतिथि के रूप में डॉ० मृदुल कुमार शुक्ला और सी०एम०साइंस कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ०संजीव कुमार मिश्रा की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को और बढ़ा दिया। नित्यार्पण कला आश्रम के बच्चों ने कथक की विविध प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। ताल, लय और भाव पर आधारित उनकी प्रस्तुतियों में कथक की परंपरागत शैली के साथ-साथ आधुनिक अभिव्यक्तियों का भी सुंदर संगम देखने को मिला। जर्मनी से आई प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय नृत्यांगना विदुषी श्रीमती दुर्गा आर्या की प्रस्तुति ने दर्शकों के बीच कथक के प्रति उत्साह जागरूक किया
संगत कलाकार में सुबीर ठाकुर ,संदीप नियोगी और प्रतिप बनर्जी ने गायन वादन से समा बांध दिया
कथक, जो भारत की शास्त्रीय नृत्य विधाओं में से एक है, अपनी भाव-भंगिमाओं और कथावाचन शैली के कारण प्रसिद्ध है। मिथिला की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में इसे प्रस्तुत करना विशेष महत्व रखता है, क्योंकि मिथिला सदियों से संगीत, नृत्य और लोककलाओं का केंद्र रहा है। इस क्षेत्र की लोकधुनों और कथक की नृत्य-शैली के मेल ने दर्शकों को एक अनूठा अनुभव दिया।
इस अवसर पर उपस्थित दर्शकों में भी उत्साह देखने लायक था। संगीत के छात्र सुमन कुमार सिंह ने कहा—
“आज पहली बार इतने करीब से कथक देखने का मौका मिला। नृत्य में मिथिला की झलक पाकर बहुत गर्व महसूस हुआ।”
वहीं, स्थानीय संस्कृति प्रेमी शिवम शेखर ने कहा—
“नित्यार्पण कला आश्रम का यह प्रयास न केवल बच्चों की प्रतिभा को मंच दे रहा है, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर को भी नई दिशा दे रहा है।”
कार्यक्रम में बेद प्रकाश ,ममता रानी ठाकुर ,समित झा,रजनीश सर ,और सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। सभी ने बच्चों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यक्रम का संचालन सुजन झा और ऋचा ठाकुर ने किया और धन्यवाद ज्ञापन रुपेश कुमार गुप्ता ने प्रस्तुत किया।
नित्यार्पण कला आश्रम का यह प्रयास कथक जैसी शास्त्रीय कला के संरक्षण के साथ-साथ मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को और सशक्त बनाने की दिशा में एक सार्थक पहल साबित हुआ।
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