बेटे से एक कदम आगे निकली बेटी, लॉक डाउन के बीच बेटी ने पिता को साईकिल पर बिठा कर गुड़गाव से पहुंच गयी दरभंगा, भूख प्यास के बीच 7 दिन बाद पहुंची दरभंगा, गाँव के लोगो ने लड़की के जज्बे और हौसले को किया सलाम
महज 15 साल की ज्योति की इन दिनों गाँव में न सिर्फ खूब चर्चा है बल्कि लोग उनकी खूब तारीफ की और भला उसकी तारीफ हो भी क्यू नहीं आखिर उसने जो किया यह हर किसी के लिए संभव भी नहीं ।
मज़बूरी के सामने दुरी कोइ माईने नहीं रखता यही वजह है की लॉक डाउन में लोग जान जोखिम ने डाल एक लम्बी सफर पर निकल रहे है | ऐसी ही कहानी है दरभंगा ज़िले की सिरुहुलिया गांव की रहनेवाली ज्योति की | ज्योति अपने पिता मोहन पासवान को साइकिल पर पीछे बिठा कर एक हजार किलोमीटर से ज्यादा की दुरी 7 दिन में तय कर गुड़गाव से बिहार के दरभंगा पहुँची

गयी । रास्ते में कई परेशानियां भी हुई लेकिन हर परेशानी को ज्योति पार करती गयी लेकिन हिम्मत कभी नहीं हारी । ज्योति और उसके पिता दो दिनों तक भूखे भी रहे कही कही रास्ते में उन्हें जरूर मदद भी मिली कुछ लोगो ने खाना खिलाया तो कसी ने पानी । ज्योति एक दिन में 100 से 125 किलोमीटर रोज अपने पिता को पीछे साईकिल पर बिठा कर चलाती थी और जब कही ज्यादा थकान होता सड़क पर ही बैठ थोड़ा आराम भी कर लेती थी बीच बीच में गर्मी से बचने के लिए अपने चेहरे पर पानी मार थोड़ी राहत सांस लेकर फिर अपने गाँव के लिए आगे निकल परती थी आखिरकार अंत में ज्योति अपनी मंजिल साथ दिन बाद पहुच ही गयी ।
ज्योति के गाँव पहुचने के बाद अब गाव वालो इस छोटी सी बच्ची पर अब गर्व महसूस कर रहे है बच्ची के जज्बे को सलाम करते हुए ग्रामीण निर्भय शंकर भारद्वाज ने कहा कि ज्योति ने यह साबित कर दिया की बेटियां बेटे से कम नहीं बल्कि उससे एक कदम आगे है और उन्हें फक्र है कि ज्योति उनके गाव की बेटी है और वे उनके गाव के निवासी है ।
दरअसल ज्योति के पिता गुड़गाव में रहकर किराए पर लेकर इ रिक्शा चलाने का काम करते है लेकिन कुछ महीने पहले उनका एक्सीडेंट हो गया तब अपने पिता को देखने ज्योति गुड़गाव गयी थी इसी बीच कोरोना संकट के बीच देश में लॉक डाउन की घोषणा हो गयी ऐसे में ज्योति के पिता का काम ठप पर गया ऊपर से रिक्शा मालिक का पैसे का लगातार दबाब बन रहा था पर ज्योति के पिता के पास पेट भरने को पैसे थे न ही रिक्शा मालिक को देने के पैसे थे ऐसे में ज्योति ने यह फैसला किया कि यहाँ भूखे मरने से अच्छा है अपने गाव किसी तरह निकल जाए पर साधन नही होने की वजह से ज्योति ने यह लंबी दूरी की सफर अपने साईकिल से ही पूरी करने की ठानी हालांकि ज्योति के पिता इसके लिए तैयार नहीं थे लेकिन मज़बूरी ऐसी थी की पिता को बेटी के फैसले में आखिरकार सहमति जातानि परी इसके बाद दोनों कठिन परिस्थितियों का मुकाबला क्र अपने बुलंद हौसले के साथ किया इसके बाद वह गाव पहुच गया ।
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