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कुलपति ने किया ‘पारिजात-मंजरी’ का विमोचन

कुलपति ने किया ‘पारिजात-मंजरी’ का विमोचन

मैथिली एक समृद्ध भाषा है और इसे समृद्ध बनाने में मिथिला के विद्वानों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। यह निर्विवाद सत्य है कि भाषा के विकास में ही क्षेत्र का विकास सन्निहित होता है। आज संस्कृत जैसी विकसित एवं परिष्कृत भाषा भी लोगों की उदासीनता के कारण उपेक्षित होती दिखाई देती है, यह चिंता का विषय है। संस्कृत के नाम पर कई विश्वविद्यालय और महाविद्यालय हैं। बावजूद इसके इन संस्थानों में छात्रों की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। मैथिली के विकास के लिए हमें मिलकर काम करने की जरूरत है। ये बातें सोमवार को प्रो. रमण झा कृत ‘पारिजात – मंजरी’ के विमोचन के अवसर पर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र प्रसाद सिंह ने कही।
उन्होंने छात्रों तथा शिक्षकों के लिए इस पुस्तक को उपयोगी बताते हुए कहा कि यह विशेष रूप से शोधार्थियों के लिए बेहद लाभकारी होगा। क्योंकि इसमें न सिर्फ अनेक शोध-आलेख संग्रहित हैं, बल्कि इस विश्वविद्यालय से मैथिली विषय में प्राप्त शोध-उपाधि की अद्यतन सूची भी शोध के विषयों के साथ संकलित हैं, जिससे उसके पाँच गुना शोध के विषय शोधार्थियों के दृष्टिपथ पर सहज आ सकेंगे। उन्होंने सभी विषयों में इस तरह की सूची तैयार किए जाने की आवश्यकता पर बल देते कहा कि सभी विभागाध्यक्षों को इसके लिए कारगर कदम उठाना चाहिए ताकि यहाँ के शोधार्थियों को समुचित मार्गदर्शन मिल सके।
मौके पर उन्होंने विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव सह अभिषद् सदस्य डाॅ बैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’ के मिथिला व मैथिली के सर्वांगीण विकास के प्रति समर्पण की सराहना करते कहा कि ऐसे ही कर्मठ और भाषानुरागी व्यक्तियों के कारण आज मैथिली सशक्त भाषा के रूप में वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित होती दिखाई देती है।
स्वागत संबोधन में डाॅ बैद्यनाथ चौधरी’बैजू’ ने विश्वविद्यालय के चतुर्दिक विकास के प्रति कुलपति की तत्परता की प्रशंसा करते हुए कुलपति से 49वें मिथिला विभूति पर्व समारोह के अवसर पर ‘विद्यापति चेयर’ के क्रियान्वयन की घोषणा का प्रस्ताव रखा। पूर्व विभागाध्यक्ष तथा ‘पारिजात-मंजरी’ के रचनाकार प्रो. रमण झा ने कुलपति के प्रति आभार प्रकट करते कहा कि अपने व्यस्ततम दिनचर्या से बहुमूल्य समय निकालकर पुस्तक का विमोचन कर अपने आशीर्वचनों से उन्होंने कृतकृत्य कर दिया। प्रो. झा ने कहा कि जिस तरह महान व्यक्तियों द्वारा स्थापित पत्थर देवत्व को प्राप्त कर लेता है। वैसे ही कुलपति महोदय के करस्पर्श से इस पुस्तक की भी गरिमा बढ़ेगी। विभागीय शिक्षक प्रो. अशोक कुमार मेहता की समसामयिक रचना ‘झिहिर झिहिर झहड़य बरखा सोहागिन…’ के सस्वर पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस अवसर पर पीजी मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश झा, प्रो. दमन कुमार झा, अनिल कुमार, प्रवीण कुमार झा, लाल बाबू यादव आदि उपस्थित की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

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