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कांवरियों ने गंगाजल से किया बाबा सिद्धेश्वरनाथ का जलाभिषेक

कांवरियों ने गंगाजल से किया बाबा सिद्धेश्वरनाथ का जलाभिषेक

 

मनीगाछी प्रखंड के टटुआर पंचायत अंतर्गत विशौल गांव स्थित प्राचीन बाबा सिद्धेश्वरनाथ महादेव मंदिर में सिमरिया से पैदल एवं वाहन से गंगाजल लाकर सैकड़ों कमरथुओं ने बुधवार को जलाभिषेक किया। मंदिर में जलाभिषेक करने वाले भक्तों की कतार देर शाम तक लगी रही।

प्रातः काल गांव के मध्य विद्यालय के समीप स्थित तालाब से भव्य कलश यात्रा की शक्ल में जल लाकर 108 कुंवारी कन्याओं ने बाबा सिद्धेश्वरनाथ पर अर्पित किया। मंदिर प्रबंधन समिति के सदस्यों ने रंग-बिरंगी झांकियों एवं ढोल-नगाड़े के साथ पैदल कांवर यात्रियों का गांव की सीमा पर अगवानी की और हर हर महादेव के जयघोष के साथ मंदिर के प्रांगण में पहुंचे।

मंदिर प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष सह टटुआर पंचायत के पूर्व मुखिया प्रो जीवकांत मिश्र ने बताया कि परंपरा के अनुसार महाशिवरात्रि के अवसर पर पं राकेश कुमार मिश्र के नेतृत्व में पंडितों द्वारा रात्रि में चारों पहर शिव विवाह की पूजन रस्म की अदायगी की जाएगी। साथ ही महाशिवरात्रि महोत्सव के दौरान पं राधेश्याम झा के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत कथा वाचन की रसधार 17 फरवरी तक निरंतर बहेगी।

उधर, श्रीमद्भागवत कथा वाचन यज्ञ के पांचवें दिन महाशिवरात्रि के अवसर पर कथावाचक पं राधेश्याम झा ने महाशिवरात्रि के महात्म्य का वर्णन करते कहा कि

शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है कि महाशिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। महाशिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले चार संकल्प का नियमपूर्वक पालन करना चाहिए।

ये चार संकल्प हैं- शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा, रुद्रमंत्र का जप, शिवमंदिर में उपवास तथा काशी में देहत्याग। उन्होंने बताया कि शिवपुराण में मोक्ष के चार सनातन मार्ग बताए गए हैं। इन चारों में भी शिवरात्रि व्रत का विशेष महत्व है। अतः इसे अवश्य करना चाहिए।

क्योंकि यह सभी के लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकामभाव से सभी मनुष्यों, वर्णों, स्त्रियों, बालकों तथा देवताओं के लिए यह महान व्रत परम हितकारक माना गया है। प्रत्येक मास के शिवरात्रि व्रत में भी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी में होने वाले महाशिवरात्रि व्रत का शिवपुराण में विशेष महात्म्य है।

उन्होंने इस व्रत के वैज्ञानिक पक्ष का उल्लेख करते हुए बताया कि महाशिवरात्रि पर चंद्रमा और पृथ्वी की स्थिति मानव शरीर की जैविक घड़ी को संतुलित करने में मदद करती है। इस दिन व्रत रखने से शरीर का पाचन तंत्र सुधारता है, विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और मेटाबॉलिज्म सही रहता है। इससे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसलिए उपवास करने से शरीर की ऊर्जा शुद्ध होती है और मन शांत रहता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि महाशिवरात्रि की रात को जागने से शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर बढ़ता है, जो तनाव कम करता है, मानसिक शांति और ध्यान केंद्रित करने की शक्ति बढ़ाता है, गहरी आध्यात्मिक अनुभूति उत्पन्न करता है।

उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल मानव मस्तिष्क और समुद्र की लहरों पर प्रभाव डालता है। पूर्णिमा और अमावस्या के समय मनुष्य की भावनाएँ अधिक संवेदनशील होती हैं। महाशिवरात्रि अमावस्या की रात के ठीक पहले आती है, इसलिए यह मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सर्वोत्तम समय माना जाता है। इस रात ध्यान करने से मन शांत होता है और व्यक्ति गहरी आंतरिक चेतना से जुड़ सकता है।

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